ख़्वाब एक ज़िंदगी थी सो ख़याल में गई
तेरे बाद-ए-हिज्र तेरे ही विसाल में गई
ख़स्ता जिस्म के फ़िराक़ की थी ये मिसाल और
हिज्र में ये ज़िन्दगी इसी मिसाल में गई
कुछ तो तेरी याद आती है कभी कभी मुझे
इस के बा'द बेकली इसी ख़याल में गई
वो अज़ाब-ए-खौफ़-ओ-ग़म में ग़र्क़-ए-आब फ़ैसला
मेरी जाँ उसी जबाव के मलाल में गई
अब न तुम वो तुम हो और अब न ही मैं वो मैं हूँ
पाया उस को खोने में ही जाँ ज़वाल में गई
— Naresh sogarwal 'premi'















