दर्द जब आँख के बाम-ओ-दर होते हैं
क्या करें शाम को सब ही घर होते हैं
झपकियाँ लेती आँखें उचट जब गईं
तब हुआ इल्म ख़्वाबों के पर होते हैं
जब बदन से निकल कर कोई रोता है
रूह के दिल दिमाग़ और सर होते हैं
जिन से उम्मीद है सबकी कुछ करने की
लोग वो ख़ुदस ही बे-ख़बर होते हैं
मिल के जो परवरिश करते हैं बच्चों की
अस्ल में वे ही कुंबे प्रवर होते हैं
जो समझते हैं दुख दूसरों का वही
लोग सच्चे ख़ुदा के बशर होते हैं
— Naresh sogarwal 'premi'















