इश्क़ में दिल था तो डीपी को हटाती भी नहीं
जब से बिछड़े हैं नज़र अब कहीं आती भी नहीं
मुझ से तारीफ़ें ही सुनना जिसे भाता था सिर्फ़
वो किसी और की मुँह बातें लगाती भी नहीं
सौ परेशानियों का हल था मिरा इक ही जोक
अब ये दिन देखिए वो कुछ भी बताती भी नहीं
जिस को अच्छा नहीं लगता था बदलना चीज़ें
जिस की मुद्दत से ख़बर अब कोई आती भी नहीं
चश्म-ए-तर चाक-जिगर और ये सीना-ए-फ़िगार
इतना सब होने पे ये मौत जो आती भी नहीं
— Naresh sogarwal 'premi'















