ख़िर्मन-ए-हस्ती मिरी कब की निगूँ है यूँँ है
अब तो मौजूदगी बस एक फुसूँ है यूँ है
शोख़ी से हो गया है मेरा बदन मुतग़ाइर
ख़ुशदिली फिर न दरूँ है न बरूँ है यूँ है
बदला कुछ भी तो नहीं तेरे बिछड़ने के बा'द
जैसा तू छोड़ गई मुझ को जूँ का तूँ है यूँ है
ख़ुशतरीं तुझ को ख़बर क्या कि तजर्रुद क्या है
रोज़ आ जाती है और कहती है यूँ है यूँ है
अब तुम आई हो मिरी जान मिरा पूछने हाल
अब तो दिल में न तो हूँ है न सुकूँ है यूँ है
— Naresh sogarwal 'premi'















