दिया बना के बैठा हूँ मैं दिल को अपने दाज पर

पढ़ो मुझे किधर से भी मिसाल-ए-बैत-ए-ताज पर

तिरी मुराद भी नहीं तिरा फ़िराक़ भी नहीं
उदास हो मैं जाता हूँ सो अपने ही मिज़ाज पर

मुझे तो वैसे ज़िन्दगी में ग़म की भी कमी नहीं
प शाद हो मैं जाता हूँ भले सुख़न की लाज पर

बड़ी जवाबदेही का ही काम है ये लिखना भी
है ए'तिबार मुझ को अपने नेक काम-काज पर

भरोसा कल का तो नहीं रहें न भी रहें मगर
सुरूर अपना छोड़ देते हैं किसी भी आज पर

— Naresh sogarwal 'premi'

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