बग़ैर देखे मुझे क्या वो सो न पाएगा
शब-ए-फ़िराक़ अगरचे बहुत सताएगा
तिरे सिवाए मुझे कौन मिलने आएगा
अधूरा तू ही अगर मुझ
में छूट जाएगा
तुम्हें ज़रूर हिफ़ाज़त से कोई रक्खेगा
मगर दवा कहाँ से हिज्र की वो लाएगा
दिया हुआ किसी का ग़म कोई नहीं लेता
तिरा यूँ छोड़ के जाना बहुत रुलाएगा
गो तेरे बा'द तुझे याद करता रहता हूँ और
मैं सोचता हूँ मुझे कौन ऐसे चाहेगा
— Naresh sogarwal 'premi'















