और यूँँ ही ये त्योहार आते रहें
याद तुम को हमारी दिलाते रहें
ये मोहब्बत की ख़्वाहिश भी है इंतिज़ार
इश्क़ में जान अपनी जलाते रहें
लड़कियाँ देर तक ही मना करती हैं
उन का बस चैन और चित चुराते रहें
औरतें अपनी हस्ती को हैं चाहती
मर्द इज़्ज़त से बस पेश आते रहें
ज़िंदा रहने की तरकीब ये है कि दोस्त
अपनी बेचैनी ख़ुद ही बढ़ाते रहें
— Naresh sogarwal 'premi'















