ग़म ही मुझ को कहीं ये खा जाए

बिन मुहब्बत के मौत आ जाए

चेहरा अपना मुझे दिखा जाए
दूर से हाथ ही हिला जाए

जाँ से हालत है मेरी ना-वाक़िफ़
आज मुझ को कोई रुला जाए

कैसे हो आप पूछकर मुझ से
ख़ुदस ही मझको वो मिला जाए

बालों में हाथ फेर के निंदिया
थपकियों से मुझे सुला जाए

भर के ग़म बे-निशान ज़ख़्मों में
इस सुकूँ की ख़ुशी मिटा जाए

वो कभी जिस से मैं मिला नहीं और
इक दफ़ा छोड़ के चला जाए

रूह में मेरी रहता जो हर-दम
मुझ से वो हाथ तो लगा जाए

— Naresh sogarwal 'premi'

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