फूल से ख़्वाबों की शब मेरी यूँँ भी शूल गई
ज़िन्दगी मेरी शब ए हिज्र में मशग़ूल गई
जब से इक रात के हम बिछड़े हैं तब से गोया
मेरी ये रात सहर होना ही फिर भूल गई
तेरी तस्बीह में दिल जबसे मिरा डूब गया
मेरी मज़मूओं से ये डाइरी यूँ फूल गई
दोस्त ये हिज्र है जो ले रहा है काम मुझे
अस्ल में पूरे मिरे जिस्म पे जम धूल गई
मेरे दिल को अभी दस्तक की है उम्मीद कहीं
और लटक के सदा मेरी कभी की झूल गई
गोया वापस मिरी आवाज़ ही आ लौटती है
सुनता हूँ जिस सदा को वो तो मुझे भूल गई
— Naresh sogarwal 'premi'















