ये मजबूरियाँ और इहानत हमारी
लगन खा गई तंग हालत हमारी
हमें उन की बाहों में होना था लेकिन
लिपट सो रही है ये उज़्लत हमारी
बिना लम्स के ही हैं तेरी ये यादें
मिलन खा गई दश्त-ए-ग़ुर्बत हमारी
बशर जिन के हम थे कभी ख़ुश सुहावा
ख़फ़ा हो गए वो इक़ामत हमारी
हुआ क्या अगरचे भी हिजरत में हम से
कि रहती है ख़ुदस शिकायत हमारी
अगर अच्छा होता कि अहमक़ ही होते
बहुत दे रही दुख ज़िहानत हमारी
— Naresh sogarwal 'premi'















