गोया अब तो ठोकरें मैं दर-ब-दर की खा रहा हूँ

मोजिज़ा ये है कि मैं फिर भी जिए ही जा रहा हूँ

तेरे बाद-ए-हिज्र मुझ में तेरा साया ही रहा है
मैं तिरे बैरून बन के एक साया सा रहा हूँ

हो गई है बे-ख़बर शायद मुरव्वत से ये क़ुदरत
मैं ने जैसा भी किया वैसा नहीं मैं पा रहा हूँ

सुन मिरी आवाज़ मेरे दिल की ओ निस्फ़-ए-तमन्ना
छोड़ कर रूह अपनी मैं इस तन को ले कर जा रहा हूँ

— Naresh sogarwal 'premi'

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