इस दरिया के नज़दीक खड़ा सूखा शजर है
बस तेरी मुलाक़ात में बातों का असर है
मैं ने तिरी आवाज़ बहुत कम ही सुनी पर
फिर भी तिरी हिजरत का बहुत शोर-ओ-शरर है
मैं ने तुझे देखा भी है आईने के जैसे
और आईने के जैसे मिरा ज़ेर-ओ-ज़बर है
अब हालत-ए-दिल इतनी है बेकार कि गोया
ग़ाफ़िल है तू लेकिन सभी कुछ तुझ को ख़बर है
अब खो गए असरार-ए-तअल्लुक़ से कहीं हम
मैं भी हूँ नज़र मख़्फ़ी तू भी मख़्फ़ी नज़र है
— Naresh sogarwal 'premi'















