कितने चेहरे एक चेहरे पर लगा ख़ुद ग़ुम हुई
आइने से जूझता साकित हक़ीक़त और मैं
सब्र और ईमान से प्याला मिली हाला नहीं
फिर तराज़ू पर पड़े हैं दीन दौलत और मैं
तोड़ लाना है ख़ला के शाख़ से कोकब हसीं
गिरते पड़ते बढ़ रहे हैं इश्क़ हिम्मत और मैं
कोह से टकरा रही है ज़िंदगी एक बार फिर
जीतता है कौन देखें या कि क़िस्मत और मैं
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हवा जंगल घटा रोई नदी सूखी हुआ क्या है
उजाड़ा है चमन जिस ने भला उस की सज़ा क्या है
उजाड़ा है चमन जिस ने भला उस की सज़ा क्या है
सितारों पर जो रहते थे गली में फिर रहे साहब
सियासी बात लगती है पता कर माजरा क्या है
लगा कर आग सीनों में जिन्होंने रोटियाँ सेकीं
खुरच कर ज़ख़्म वो हर बार पूछे अब हुआ क्या है
सिसक कर तीरगी में उम्र को गुमनाम क्यूँ करना
चराग़ों की तरह जल देख जीने में मज़ा क्या है
बहुत उलझे हैं मंसूबे समझना 'प्रीत' है मुश्किल
यहाँ ख़ुदग़र्ज़ दुनिया में वफ़ा क्या है दग़ा क्या है
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तेरी गोदी में पहली बार जब आया बहुत रोया
जुदा होकर तेरी गोदी से मैं पापा बहुत रोया
जुदा होकर तेरी गोदी से मैं पापा बहुत रोया
फ़ना कर के शजर सारे मैं इतराया अमीरी पे
जो आई साँस पे आफ़त पकड़ माथा बहुत रोया
क़दीमी पाप नदियों में बहा फिर पाप करते हैं
ठगी ये देख कर बेबस हुआ दरिया बहुत रोया
ख़िताबें ख़ूब हासिल की दुशाला वाह-वाही भी
रिज़र्वेशन ने जब मारा भरम टूटा बहुत रोया
हुआ मुश्किल मिलाना काफ़िया तुम से मुहब्बत में
मगर तुक तोड़ कर तुम से नयन मेरा बहुत रोया
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Ragini Preet
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पसीना पोटली में बस लिए लौटा है दिनभर की
यही तनख़्वाह है इस देश में मज़दूर नौकर की
यही तनख़्वाह है इस देश में मज़दूर नौकर की
भला फ़ौलाद बनकर भी जहाँ को किस ने जीता है
यहाँ चंगेज़ भी हारा मिटी हस्ती सिकंदर की
हथेली की लकीरें तुम से मंज़िल का पता पूछें
नई पहचान लिख हाथों से ख़ुद अपने मुक़द्दर की
न रख तलवार हाथों में क़लम की धार पैनी रख
मिटा देती है हस्ती शब्द की ताक़त सितमगर की
इबादतगाह तुम माँ-बाप के क़दमों में ही जानो
यहीं जन्नत है असली प्रीत बेज़ा खाक़ दर-दर की
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चाँदनी में जो मिला था आब-ए-शीशा की तरह
वो अमावस रात में बस इक फ़साना हो गया
एक साया साथ चलता था बदन से भी क़रीब
शाम ढलते क्यूँ न जाने उस का जाना हो गया
अब तुम्हारी याद की किर्चें नहीं चुभतीं मुझे
इश्क़ का वो हादसा बिसरा तराना हो गया
अब किसी वादे में दावों में नहीं आना मुझे
सोचती हूँ सोचने में ही ज़माना हो गया
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किसी नायाब हीरे सी हिफ़ाज़त जिस की मैं ने की
चुरा लेती थी उस दिल को फ़रेबी थीं तेरी आँखें
भरी रहती है सजदे से दुआ के अश्क में भीगी
किसी मंदिर में दीपक सी मुझे लगतीं तेरी आँखें
मुसीबत कितनी भी आए मैं उस से जीत जाऊँगी
लगा काजल का इक टीका बला हरतीं तेरी आँखें
गुज़ारी ज़िंदगी सब धूप की बैठक में जल जल कर
भरी गर्मी में शीतल छाँव सी रहतीं तेरी आँखें
ज़बाँ जो कह नहीं पाती कई पोशीदा अफ़साने
वो तेरा हाल-ए-दिल बे ख़ौफ़ हो कहतीं तेरी आँखें
अरे लहरें ख़ुमारी में गगन के पार जाती हैं
समुंदर का भी प्याला जाम से भरतीं तेरी आँखें
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