Abha sethi

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    धूल में खो चुका ज़र्रा हूँ मैं
    तुम समंदर हो, तो क़तरा हूँ मैं

    झूट के बल न चलाओ रिश्ते
    झूट से ठग के ही बिखरा हूँ मैं

    धोकों ने बदली है फ़ितरत मेरी
    हर ग़लत के लिए ख़तरा हूँ मैं

    फ़िक्र दुनिया की न है अब कोई
    सहता कोई भी न नख़रा हूँ मैं

    अपने ग़म ढाल बनाए मैंने
    तब कहीं जाके तो उभरा हूँ मैं

    छोड़ के मोह किया मन कुंदन
    पढ़ के गीता ही तो निखरा हूँ मैं
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    घेरे मुझको तेरी बाँहे हैं ऐसे
    लिपटे मन्नत का धागा कोई जैसे
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    इत्र की घुले ख़ुशबू जैसे इन हवाओं में
    महके इश्क़ अपना भी इश्क़ की वफ़ाओं में
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    खो गया था चाँद चाँदनी हुई न रात थी
    उठ गए वो पहलू से हुई न कोई बात थी
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    हया से सुर्ख़ हो जाओगे नज़रें चेहरा चूमेंगी
    तुम्हें इस फाग रंग-ए-इश्क़ से हम अपने रंगेंगे
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    वतन महबूब अपना, इश्क़ शिद्दत से निभाते हम
    मुकर्रर इक न दिन है इश्क़ हर लम्हा जताते हम

    हैं थामे हाथ रखते जान भी क़ुर्बान उस पर ही
    लिपट आँचल तिरंगे में फ़ना उसके हो जाते हम
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    मुड़ के थे देखा किए हम भी तो उसको
    फिर तो लाज़िम था ख़ुदा उसका हो जाना
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    ओढ़ के तन इश्क़ तेरा
    इश्क़ का पारा चखेंगें
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    लिया कश ज़िन्दगी का जो
    तिरी सूरत उभर आई
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    बे-सलीक़ों में सलीक़ा लाती है
    बेटियाँ घर में अदब ले आती है
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