"जंग"
एक जंग जो हम ने शुरू की एक रोज़ माजी की याद में
मन के बयाबान के किसी शजर की डालियों के टूट कर रगड़ने से सुलगी हुई चिंगारी से
किसी टापू पर बसाए गए शहरों की ऊँची बालकनियों से
मुहब्बत से बने पुल के टूटे हुए मेहराब पर बैठी तितलियों से
पुरानी किताब के मुड़े हुए पन्ने के कोने पर लिखी तारीखों से
उन तकलीफ़ों से जो तेरी कमी के बा'द मेरे सीने पर पहाड़ बन गई हैं
उन सभी सायों से जो कभी थे ही नहीं,लेकिन मैं ने महसूस किया है
उन सिलवटो से जो दालान में पड़ी चारपाई के बिस्तरे पर सिमटी हुई हैं
उन आँखों से जिन
में कोई झील नहीं,लेकिन भरी रहती हैं
उस चाय की दुकान से जहाँ पर न जाने कितने मिट्टी के कपों को हम ने तुम्हारे होंठ समझ कर चूमा है
उन सभी गजलों से जिन को तुम्हें याद कर के लिखा है
उस बलिश्त से जिस को अपने सिरहाने रख कर सोए हैं,रोए हैं
उन परिंदों से जिन्हें हम ने साथ में बैठ कर दाने खिलाये हैं
उस गुलाब से जिस की पंखुड़ियों की महक तुम्हारे जिस्म से आती रही है
और शाम को पौने सात बजे तुम्हारे शहर जाती उस ट्रेन से भी
जंग शायद सब सही कर दे,मुहब्बत ने तो लगभग नेस्तनाबूद कर दिया है
हम तुम्हारी याद के हुक्के को पिएँगे और अपने होंठों से उदासी का धुआँ फूंकते रहेंगे
Read Fullमन के बयाबान के किसी शजर की डालियों के टूट कर रगड़ने से सुलगी हुई चिंगारी से
किसी टापू पर बसाए गए शहरों की ऊँची बालकनियों से
मुहब्बत से बने पुल के टूटे हुए मेहराब पर बैठी तितलियों से
पुरानी किताब के मुड़े हुए पन्ने के कोने पर लिखी तारीखों से
उन तकलीफ़ों से जो तेरी कमी के बा'द मेरे सीने पर पहाड़ बन गई हैं
उन सभी सायों से जो कभी थे ही नहीं,लेकिन मैं ने महसूस किया है
उन सिलवटो से जो दालान में पड़ी चारपाई के बिस्तरे पर सिमटी हुई हैं
उन आँखों से जिन
में कोई झील नहीं,लेकिन भरी रहती हैं
उस चाय की दुकान से जहाँ पर न जाने कितने मिट्टी के कपों को हम ने तुम्हारे होंठ समझ कर चूमा है
उन सभी गजलों से जिन को तुम्हें याद कर के लिखा है
उस बलिश्त से जिस को अपने सिरहाने रख कर सोए हैं,रोए हैं
उन परिंदों से जिन्हें हम ने साथ में बैठ कर दाने खिलाये हैं
उस गुलाब से जिस की पंखुड़ियों की महक तुम्हारे जिस्म से आती रही है
और शाम को पौने सात बजे तुम्हारे शहर जाती उस ट्रेन से भी
जंग शायद सब सही कर दे,मुहब्बत ने तो लगभग नेस्तनाबूद कर दिया है
हम तुम्हारी याद के हुक्के को पिएँगे और अपने होंठों से उदासी का धुआँ फूंकते रहेंगे
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"हिज्र में मारी गईं नज़्में"
सर्द रात में आँखों पर पड़ी ओस से उतारी गई नज़्में
सिसकती हैं,चीख़ती हैं ,हिज्र में मारी गई नज़्में
तुम तक अब आवाज नहीं जाती मेरी
तुम तक अब मेरे ख़त भी नहीं जाते हैं
ये साए,ये अलमारियाँ,ये किताबें,ये कमरा
लौट आओ ना,सब तुम्हें बुलाते हैं
तेरे गालों पर मेरे हाथ हुआ करते थे
सुबह-ओ-शाम हम साथ हुआ करते थे
अब तन्हाई सिरहाने बैठ जाती है
तुम्हारी याद यकायक आ ही जाती है
एक क़िस्सा है जिस का छोर नहीं पाता हूँ
रोना छोड़ दिया है,बे-सबब मुस्कराता हूँ
एक चेहरा है जिसे भूल नहीं पाऊँगा
एक चेहरे पर मैं कितनी नज़्म गाऊँगा!
एक उम्मीद है तेरे लौट आने की मगर
ये माजी तो मेरी जान लिए जाता है
तेरा नाम लिखना और मिटाना रेत से
इस का सिवा मुझे कुछ और कहाँ आता है
धूप भी नहीं आती है दरीचों से
रेत भी अब ख़त्म है सेहराओं से
मन बोझिल सा,परेशान सा है
तेरी याद रिसती है मेरे घावों से
कोई है जो मेरा हाथ पकड़ने को है
बेवजह की बात पर मुझ से लड़ने को है
तू बता तेरी जगह कैसे दे दूँ
अपना हिस्सा ख़ुद ही कैसे खो दूँ
तू बता तू लौट कर आएगा ना?
तू बता मेरी नज़्म तू गायेगा ना?
कुछ गैर ज़रूरी बातें तुझ से करनी है
तेरी मोहब्बत से अपनी कब्र भरनी है
ये मौसम मुझे कितना अजीज था
इक वक़्त तू मेरे कितना क़रीब था
मुहब्बत से लड़ाई! हार जाएगा
मुझे मालूम है! तू न आएगा!
सर्द रात में आँखों पर पड़ी ओस से उतारी गई नज़्में
सिसकती हैं,चीख़ती हैं ,हिज्र में मारी गई नज़्में
Read Fullसिसकती हैं,चीख़ती हैं ,हिज्र में मारी गई नज़्में
तुम तक अब आवाज नहीं जाती मेरी
तुम तक अब मेरे ख़त भी नहीं जाते हैं
ये साए,ये अलमारियाँ,ये किताबें,ये कमरा
लौट आओ ना,सब तुम्हें बुलाते हैं
तेरे गालों पर मेरे हाथ हुआ करते थे
सुबह-ओ-शाम हम साथ हुआ करते थे
अब तन्हाई सिरहाने बैठ जाती है
तुम्हारी याद यकायक आ ही जाती है
एक क़िस्सा है जिस का छोर नहीं पाता हूँ
रोना छोड़ दिया है,बे-सबब मुस्कराता हूँ
एक चेहरा है जिसे भूल नहीं पाऊँगा
एक चेहरे पर मैं कितनी नज़्म गाऊँगा!
एक उम्मीद है तेरे लौट आने की मगर
ये माजी तो मेरी जान लिए जाता है
तेरा नाम लिखना और मिटाना रेत से
इस का सिवा मुझे कुछ और कहाँ आता है
धूप भी नहीं आती है दरीचों से
रेत भी अब ख़त्म है सेहराओं से
मन बोझिल सा,परेशान सा है
तेरी याद रिसती है मेरे घावों से
कोई है जो मेरा हाथ पकड़ने को है
बेवजह की बात पर मुझ से लड़ने को है
तू बता तेरी जगह कैसे दे दूँ
अपना हिस्सा ख़ुद ही कैसे खो दूँ
तू बता तू लौट कर आएगा ना?
तू बता मेरी नज़्म तू गायेगा ना?
कुछ गैर ज़रूरी बातें तुझ से करनी है
तेरी मोहब्बत से अपनी कब्र भरनी है
ये मौसम मुझे कितना अजीज था
इक वक़्त तू मेरे कितना क़रीब था
मुहब्बत से लड़ाई! हार जाएगा
मुझे मालूम है! तू न आएगा!
सर्द रात में आँखों पर पड़ी ओस से उतारी गई नज़्में
सिसकती हैं,चीख़ती हैं ,हिज्र में मारी गई नज़्में
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चाहा तुझे माँगू, फिर न सितारे टूटे
आँख भर आईं, दिल के किनारे टूटे
आँख भर आईं, दिल के किनारे टूटे
जिस की थी चाहत फ़क़त वो न मिला
देखे थे हमनें जो वो ख़्वाब हमारे टूटे
उस नदी ने अपना रस्ता बदल लिया
हम थे कोई सेहरा, जिस के सहारे टूटे
उस के लम्स में कोई जादू था यक़ीनन
हम भी तो उस शब इश्क़ में हारे, टूटे
तुम्हें भी अंदाज़ा हो ग़मनशीं होने का
कोई सानेहा तुम पे भी मेरे प्यारे टूटे
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बेमलतब की बातों पर इतना ग़ुस्सा ठीक नहीं
उदासी तो चल जाती है,लेकिन रोना ठीक नहीं
उदासी तो चल जाती है,लेकिन रोना ठीक नहीं
ख़ुशियाँ सारी खा जाएगी,दे जाएगी ढेरो ग़म
सोच के करना जब भी करना,प्यार वगैरा ठीक नहीं
आए वो और फूल पर बैठे , तुम उधेड़ दो पीठ
यार मेरे उस तितली को ऐसे बहकाना ठीक नहीं
उस ने मेरी नाव डुबोई, उस से ही सीखी तैराकी
मैं आख़िर ये कैसे कह दूँ कि वो दरिया ठीक नहीं
साथ तेरे रहते हैं लोग लेकिन करते नहीं मुहब्बत
या'नी लड़का ठीक तो है, लेकिन ज़्यादा ठीक नहीं
कब तक गैरों का ग़म, ढोवोगे काँधे पर 'ओम'
तुम को ही खा जाएगी ये, ऐसा करना ठीक नहीं
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तुम ने रोका नहीं है, अब चला जाऊँगा
ये धोखा नहीं है, अब चला जाऊँगा
ये धोखा नहीं है, अब चला जाऊँगा
तुम ने बताया नहीं इश्क़ है या नहीं
तुम ने सोचा नहीं है, अब चला जाऊँगा
मुहब्बत भी न करूँं और ठहर भी जाऊँ
ऐसा होता नहीं है, अब चला जाऊँगा
मेरे जाने से कौन सा तुम परेशाँ होंगे
तू तो रोता नहीं है, अब चला जाऊँगा
तुम कब तक शरीक-ए-ग़म रहोगे 'ओम'
तुम भी जाओ, मैं भी अब चला जाऊँगा
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