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दिल में नफ़रत थी जली हैं बस्तियाँ
ले गए वो सामने से अर्थियाँ
ले गए वो सामने से अर्थियाँ
कह गए आँसू मिरे अल्फ़ाज वो
जो न थीं कह पाई ये ख़ामोशियाँ
यूँ तमाशा मत करो इस प्यार का
इस तमाशे पर लगी हैं बोलियाँ
बेवज़ह काटा गया है ये शज़र
रौंद कर इस को गई थीं आँधियाँ
आपने तन्हा बनाया है मुझे
कुछ तो होंगी आप की मज़बूरियाँ
हम चमन में फिर से लाएँगे अमन
मन्दिरों मस्ज़िद की कर के सन्धियाँ
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कभी ग़र लग गया दामन पे धब्बा इस ज़माने का
तो कितना कुछ भी कर लो पर वो बेहतर हो नहीं सकता
ज़ला दो आज नफ़रत को मुहब्बत के हवाले से
जहाँ पर बैर हो सब से कभी घर हो नहीं सकता
मिलेगा बस तुम्हें उतना लिखा जितना नसीबों में
जिसे चाहें वही अपना मुकद्दर हो नहीं सकता
जुदा होकर सफ़र के बीच से फिर छोड़ कर जाना
हमारा दिल तुम्हारे दिल-सा पत्थर हो नहीं सकता
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कितने दर्द सहेजे हम ने,तब जा कर ये गीत लिखे हैं
तुम क्या जानों इन नयनों की कितनी पीर पुरानी होगी
तुम क्या जानों इन नयनों की कितनी पीर पुरानी होगी
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