दिल में नफ़रत थी जली हैं बस्तियाँ
ले गए वो सामने से अर्थियाँ
कह गए आँसू मिरे अल्फ़ाज वो
जो न थीं कह पाई ये ख़ामोशियाँ
यूँ तमाशा मत करो इस प्यार का
इस तमाशे पर लगी हैं बोलियाँ
बेवज़ह काटा गया है ये शज़र
रौंद कर इस को गई थीं आँधियाँ
आपने तन्हा बनाया है मुझे
कुछ तो होंगी आप की मज़बूरियाँ
हम चमन में फिर से लाएँगे अमन
मन्दिरों मस्ज़िद की कर के सन्धियाँ
— Puneet Mishra Akshat















