जिसे चाहा वही अपना तो दिलबर हो नहीं सकता
मुहब्बत का सबब हर दम मुयस्सर हो नहीं सकता
कभी ग़र लग गया दामन पे धब्बा इस ज़माने का
तो कितना कुछ भी कर लो पर वो बेहतर हो नहीं सकता
ज़ला दो आज नफ़रत को मुहब्बत के हवाले से
जहाँ पर बैर हो सब से कभी घर हो नहीं सकता
मिलेगा बस तुम्हें उतना लिखा जितना नसीबों में
जिसे चाहें वही अपना मुकद्दर हो नहीं सकता
जुदा होकर सफ़र के बीच से फिर छोड़ कर जाना
हमारा दिल तुम्हारे दिल-सा पत्थर हो नहीं सकता
— Puneet Mishra Akshat















