रक़ीबों की रियासत में सियासतदार होते हैं

मैं जाता हूँ जहाँ पर ख़्वाब भी दुश्वार होते हैं

नहीं भाती मुहब्बत की यहाँ पर दास्ताँ सब को
जो आँखें चार हो जाएँ तो पहरेदार होते हैं

महज़ सीधा-सा होता है वो रस्ता दिल में जाने का
अगर हम आप के खुदके रियासतदार होते हैं

यहाँ अब कौन करता है ज़माने में वफ़ा उल्फ़त
यहाँ उल्फ़त के आड़े जिस्म के व्यापार होते हैं

मुझे बीता हुआ अपना ज़माना याद आता है
कहाँ फिर से वो बचपन के भला इतवार होते हैं

तेरी तस्वीर अब भी मेरी आँखों में उभरती है
यही अस्बाब से रुसवा सरे बाज़ार होते हैं

— Puneet Mishra Akshat

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