ज़मीं सर पे उठा लूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं
    गगन को भी कुचल दूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं

    भला औक़ात क्या इस चाँद की उस चाँद के आगे
    हज़ारों चाँद वारूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं
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    Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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    ज़माने के लिए तो मर चुका हूँ
    सहारा है तिरा सो जी रहा हूँ

    मुकम्मल ही समझना फिर मुझे भी
    फ़क़त अब क़त्ल होना रह गया हूँ

    भुलाने की है ज़िद्द-ओ-जहद जिस को
    तुम्हारे इश्क़ का वो सिलसिला हूँ

    जिसे अपनी मुहब्बत कह रही हो
    वो कोई और है, और मैं दूसरा हूँ

    मुहब्बत की नवाज़िश मौत ही है
    मुझे मारो, अभी मैं अधमरा हूँ

    मुहब्बत का असर मुझ पर नहीं है
    यूँ ही पत्थर से मैं सर पीटता हूँ

    सज़ा मुझ को अता कर तू मुनासिब
    ख़ता ये है कि तुझ को चाहता हूँ

    "शफ़क़" को खोजने निकला हूँ जबसे
    तभी से ख़ुद कहीं पर लापता हूँ
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    Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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    एक अनसुलझी पहेली बन गई है ज़िंदगी
    आज मुश्किल है तो कल आसाँ, यही है ज़िंदगी

    ज़िंदगी जिस की नहीं है कोई कीमत दुनिया में
    अस्पतालों में बड़ी सस्ती वही है ज़िंदगी

    मखमली बिस्तर पे सो कर है गुज़ारी उम्र भर
    जो सड़क पर आज लावारिस पड़ी है ज़िंदगी

    देख लो चाहे हज़ारों बार कर के कोशिशें
    हर दफ़ा ही मौत के आगे झुकी है ज़िंदगी

    अच्छा होता हम मोहब्बत ही न करते आपसे
    आपसे कर के मोहब्बत रो रही है ज़िंदगी

    नाम इस के हैं ज़रूरत के मुताबिक़ और कई
    रोटी, कपड़ा, घर, गुज़ारा, नौकरी है ज़िंदगी

    फ़र्क होता है समझ का, बात को समझो 'शफ़क़'
    सिर्फ़ अनसुलझी नहीं है, अनकही है ज़िंदगी
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    Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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    मत उठाओ मेरी अच्छाई का इतना फ़ाइदा तुम
    मैं बुरा बन जाऊँ ये फितरत नहीं है मेरी यारों
    Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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    धोका होना, क़त्ल होना बा'द उस के भी बहुत कुछ
    अब तुम्हें हम क्या बताएँ इश्क़ में क्या क्या हुआ है
    Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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    जो ज़र, फल न दे पाए वो छांव देंगे
    न काटो दरख़्तों को आँगन से लोगों

    वसीयत को रखते हो जैसे सँभाले
    सँभालो दरख़्तों को भी वैसे लोगों
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    Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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    हक जताती रह गई दुनिया "शफ़क़"
    चूम कर वो तुझ को जूठा कर गई
    Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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    महल ख़्वाबों ख़यालों का बना कर भी दिखाना है
    अगर सोचा गया है तो सजाकर भी दिखाना है

    हमेशा खुद-ब-खुद लड़कर वही ख़ुद मान जाती है
    कभी रूठे अगर तो फिर मना कर भी दिखाना है

    जिधर जाऊँ उधर करती मिरा पीछा रकीबा वो
    अगर हो सामना तो आजमाकर भी दिखाना है

    हासिल है यहाँ जी कर अगर उस की मुहब्बत फिर
    मरूँ तो ख़ाक में ख़ुद को मिलाकर भी दिखाना है

    उमर गुज़री हमारी दिल लगी करते हुए बरबस
    तो संजीदा हो दौ पैसा कमाकर भी दिखाना है

    "शफ़क़" तुम हर दफा,हर वक़्त जाते हो उसे मिलने
    मुहब्बत में उसे मिलने बुलाकर भी दिखाना है
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    Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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