Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

@sandeep_shafaq

Sandeep Singh Chouhan "Shafaq" shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"'s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अगर जो साथ है तेरा,मुझे किस बात की चिंता नसीबों से जो है मिलता,है भाई तू वही हीरा — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
ये ग़ुरूर-ए-दौलत टिकता नहीं ज़ियादा दिन लोग चाहते हैं अब राज हो मुहब्बत का — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
कोई घर, घर भी नहीं होता है औरत के बग़ैर घर को जन्नत भी बना सकती है, चाहे वो अगर — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
मुकम्मल ही समझ लो फिर मुझे भी फ़क़त अब क़त्ल होना रह गया हूँ — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
चॉकलेट की दीवानी तो सारी दुनिया है एक दूध सी गौरी मैम का हूँ मैं आशिक़ — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
ज़िंदगी के खाते से इक साल और कम हो गया है और बधाई दे रहे हैं लोग इक दूजे को इस की — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
लो फिर दिसंबर आ गया, हाँ फिर दिसंबर आ गया अगले महीने जनवरी में फिर नया साल आ गया — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
इमारतों से शहर भर गया है अब न बच सका कोई भी इंसाँ शहर में — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
यक़ीं कर लो इन्हें पढ़ कर तुम्हीं ख़ुद कही है "मीर" ने दमदार ग़ज़लें — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
बेटे जो भेजे हैं सरहद से बुला लो साहब कोख माँओं की उजड़ने से बचा लो साहब — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
ये चॉकलेट और फूलों तक तो ठीक भी था मुझ को समझ न आया लेकिन ये भालू का रोल — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
अपने हिस्से की मोहब्बत बाँट कर ख़ैरात में चल दिए ख़ैरात में हम फिर मोहब्बत माँगने — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
सुनो जानाँ तुम आओ तो दिसंबर तक चली आना गुज़र जाए न अब की जनवरी भी हिज्र में जानाँ — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
अब ज़रूरी है नहीं मुझ को वसाइल कोई उस की यादों के सहारे ही जी लूँगा कुछ दिन — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
काश बढ़ जाए ज़रा सा रात में सर्दी का मौसम रूठ के सोई है वो,फिर से क़रीब आ जाए शायद — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

Ghazal

पहली बारिश की कुछ बूँदें ठहरी पत्तों पर धूप खिली और फिर छाई हरियाली पत्तों पर आना जाना मौसम की फ़ितरत में होता है इस मौसम के बा'द में होगी सर्दी पत्तों पर ख़ैर बहारों का मौसम भी लाते हैं पत्ते पतझड़ की भी ज़िम्मेदारी होगी पत्तों पर तुम क्या जानो कितने काम लिए हैं पत्तों से कितनो ने लिक्खी है प्रेम कहानी पत्तों पर रोज़ शिकायत रहती है फूलों को माली से आख़िर उस ने ज़ियादा मेहनत क्यूँ की पत्तों पर इतनी बात से ही फूलों ने खिलना छोड़ दिया क्यूँ फूलों से उड़ कर तितली बैठी पत्तों पर — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
क्या करें हम फ़रवरी का अब हमारा है न कोई इन गुलाबों का करें क्या अब हमारा है न कोई ये नया क़िस्सा मोहब्बत का मुबारक हो तुम्हें ही हम को रोना है पुराना अब हमारा है न कोई इश्क़ क्या है ? क्या मुहब्बत ? कुछ नहीं, सब है दिखावा इश्क़ से अच्छा है मरना अब हमारा है न कोई सिर्फ़ कहने से हमारा, कौन होता है हमारा क्या हमारा, क्या तुम्हारा, अब हमारा है न कोई फूल ख़ुशबू इश्क़ बोसा आप को सब कुछ दिया है हम को पत्थर से नवाज़ा अब हमारा है न कोई चाँद के मानिंद था महबूब दुनिया में हमारा अब तो मुश्किल है गुज़ारा अब हमारा है न कोई कौन है, किस का ख़ुदा है? कुछ नहीं बख़्शा हमें तो क्यूँ करें हम उस का सज्दा? अब हमारा है न कोई और कोई ख़्वाहिश नहीं हम को 'शफ़क़' अब ज़िंदगी से कर लिया जाँ का ख़सारा अब हमारा है न कोई — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
महल ख़्वाबों ख़यालों का बना कर भी दिखाना है अगर सोचा गया है तो सजाकर भी दिखाना है हमेशा खुद-ब-खुद लड़कर वही ख़ुद मान जाती है कभी रूठे अगर तो फिर मना कर भी दिखाना है जिधर जाऊँ उधर करती मिरा पीछा रकीबा वो अगर हो सामना तो आजमाकर भी दिखाना है न हासिल है यहाँ जी कर अगर उस की मुहब्बत फिर मरूँ तो ख़ाक में ख़ुद को मिलाकर भी दिखाना है उमर गुज़री हमारी दिल लगी करते हुए बरबस तो संजीदा हो दौ पैसा कमाकर भी दिखाना है "शफ़क़" तुम हर दफा,हर वक़्त जाते हो उसे मिलने मुहब्बत में उसे मिलने बुलाकर भी दिखाना है — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
फिर वही क़िस्से कहानी कर रहे हो यार तुम या'नी इक सहरा में पानी कर रहे हो यार तुम थी मुहब्बत बादशाहों को कनीज़ों से मगर उन कनीज़ों को ही रानी कर रहे हो यार तुम ख़ूब बेचा है सियासत-दाँ ने मेरे मुल्क को फिर हुकूमत ख़ानदानी कर रहे हो यार तुम गुफ़्तगू करनी है मुझ को आज ये महताब से रात मेरी कब सुहानी कर रहे हो यार तुम वो ज़माना था अलग जब इश्क़ में मरते थे लोग बात ये काफ़ी पुरानी कर रहे हो यार तुम फ़र्क़ होता है बहुत इन की बुलंदी में ऐ दोस्त जुगनू को तारे का सानी कर रहे हो यार तुम शा'इरी करना अदब की बात है समझो 'शफ़क़' शा'इरी में बद-ज़बानी कर रहे हो यार तुम — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
एक अनसुलझी पहेली बन गई है ज़िंदगी आज मुश्किल है तो कल आसाँ, यही है ज़िंदगी ज़िंदगी जिस की नहीं है कोई कीमत दुनिया में अस्पतालों में बड़ी सस्ती वही है ज़िंदगी मखमली बिस्तर पे सो कर है गुज़ारी उम्र भर जो सड़क पर आज लावारिस पड़ी है ज़िंदगी देख लो चाहे हज़ारों बार कर के कोशिशें हर दफ़ा ही मौत के आगे झुकी है ज़िंदगी अच्छा होता हम मोहब्बत ही न करते आपसे आपसे कर के मोहब्बत रो रही है ज़िंदगी नाम इस के हैं ज़रूरत के मुताबिक़ और कई रोटी, कपड़ा, घर, गुज़ारा, नौकरी है ज़िंदगी फ़र्क होता है समझ का, बात को समझो 'शफ़क़' सिर्फ़ अनसुलझी नहीं है, अनकही है ज़िंदगी — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

Nazm

"सज़ा-ए-मोहब्बत" आजकल इस बाग में मायूसी पसरी रहती है अब यहाँ की ख़ुशबुओं को मार कर गंध ने अपना ठिकाना कर लिया है सारे पत्ते ज़र्द होकर गिर पड़े हैं कोई तितली भी यहाँ दिखती नहीं है अब और गिन रहे हैं फूल अपनी आख़िरी साँसें प्यास के मारे परिंदे छटपटा कर मर चुके हैं मुंतज़िर है आज भी वो झूला झूलते थे बैठ कर जिस पर कई घंटों तलक और बातें करते थे जन्मों की हम दोनों मुंतज़िर है फिर किसी के आने को और मोहब्बत के वही झूले झुलाने को हाँ मगर वो वक़्त लौटेगा नहीं वापस कभी मैं बताने आया हूँ अब नहीं आएगी वापस, वो यहाँ इस बाग में मेरे सारे ख़त जलाकर राख़ कर डाले हैं उस ने अब वो रौनक बन गई है एक सरकारी मुलाज़िम की हवेली की और दौलत का नशा करने लगी है अब उसे ख़्वाहिश नहीं है लौट आने की यहाँ और न याद आती है उस को मेरी अब कह रहा हूँ, कह रहा हूँ, बारहा मैं कह रहा हूँ ये मोहब्बत इक सज़ा है हाँ मोहब्बत इक सज़ा है अब मोहब्बत तुम न करना यार पागल तुम न बनना अब मोहब्बत तुम न करना यार पागल तुम न बनना — Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"