महल ख़्वाबों ख़यालों का बना कर भी दिखाना है
अगर सोचा गया है तो सजाकर भी दिखाना है
हमेशा खुद-ब-खुद लड़कर वही ख़ुद मान जाती है
कभी रूठे अगर तो फिर मना कर भी दिखाना है
जिधर जाऊँ उधर करती मिरा पीछा रकीबा वो
अगर हो सामना तो आजमाकर भी दिखाना है
न हासिल है यहाँ जी कर अगर उस की मुहब्बत फिर
मरूँ तो ख़ाक में ख़ुद को मिलाकर भी दिखाना है
उमर गुज़री हमारी दिल लगी करते हुए बरबस
तो संजीदा हो दौ पैसा कमाकर भी दिखाना है
"शफ़क़" तुम हर दफा,हर वक़्त जाते हो उसे मिलने
मुहब्बत में उसे मिलने बुलाकर भी दिखाना है
— Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"















