एक अनसुलझी पहेली बन गई है ज़िंदगी

आज मुश्किल है तो कल आसाँ, यही है ज़िंदगी

ज़िंदगी जिस की नहीं है कोई कीमत दुनिया में
अस्पतालों में बड़ी सस्ती वही है ज़िंदगी

मखमली बिस्तर पे सो कर है गुज़ारी उम्र भर
जो सड़क पर आज लावारिस पड़ी है ज़िंदगी

देख लो चाहे हज़ारों बार कर के कोशिशें
हर दफ़ा ही मौत के आगे झुकी है ज़िंदगी

अच्छा होता हम मोहब्बत ही न करते आपसे
आपसे कर के मोहब्बत रो रही है ज़िंदगी

नाम इस के हैं ज़रूरत के मुताबिक़ और कई
रोटी, कपड़ा, घर, गुज़ारा, नौकरी है ज़िंदगी

फ़र्क होता है समझ का, बात को समझो 'शफ़क़'
सिर्फ़ अनसुलझी नहीं है, अनकही है ज़िंदगी

— Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"

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