Viru Panwar

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    कब मुलाक़ात हो सकी उस से
    उम्र भर दूरी ही रही उस से

    दुनिया के सब ग़मों का मरकज़ मैं
    और है दुनिया में ख़ुशी उस से

    उसे देखा तो ये ख़याल आया
    बनी होगी ये सादगी उस से

    तितलियाँ उस की नक़्ल करती हैं
    जुगनू लेते हैं रौशनी उस से

    शेरों में जिस की बात करता हूँ
    बात तक भी नहीं हुई उस से
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    कोई ख़ामोश है मेरे अंदर
    शोर बेहोश है मेरे अंदर

    इसलिए छोड़ कर नहीं जाता
    दर्द मदहोश है मेरे अंदर

    जब से इंकार कर गया है वो
    इश्क़ बेहोश है मेरे अंदर
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    गर कभी फिर से जन्म लूँगा मैं
    पैदा होते ही मर मिटूँगा मैं

    ये उदासी की आख़िरी हद है
    शेर भी अब नहीं कहूँगा मैं

    चाहे जैसे भी पेश आए वक़्त
    अपनी रफ़्तार से चलूँगा मैं

    ख़ैर सोचा तो था कि अपने शेर
    उस की आवाज़ में सुनूँगा मैं
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    जब से उस के घर का रस्ता भूल गया
    उस दिन से मैं चलना फिरना भूल गया

    वो मुझ को ऐसे भूला जैसे कोई
    मेले में अपना ही बच्चा भूल गया

    उस से मिल कर मैंने पूछा पहचाना
    उस ने देखा सोचा बोला भूल गया
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    जिस के हम मुंतज़िर थे अर्से से
    जा चुका दूसरे वो रस्ते से

    कौन मेरी ख़ुशी का दुश्मन था
    किस ने मुझ को बचाया मरने से

    उस से तुम बातें करते रहना दोस्त
    बात बनती है बात करने से
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    उस की ख़ुश्बू ने भी बिखरना है
    रंग रंगों का भी उतरना है

    जौन का काम पूरा करना है
    उसकी ख़ुश्बू में रंग भरना है

    धमकियाँ ख़ुदकुशी की दे कर के
    ज़िंदगी से मज़ाक करना है

    हो तो सकता नहीं मगर फिर भी
    वक़्त अच्छा घड़ी में भरना है

    मौत का कोई ऐतिबार नहीं
    मुझ को तो ख़ुदकुशी से मरना है

    सामने आ कि देख कर तुझ को
    आज आईने ने सँवरना है
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    शहर में जब जनाब होते थे
    काँटे भी तब गुलाब होते थे

    हुई उस दौर में मोहब्बत जब
    दिलों पे भी नक़ाब होते थे

    जिन दिनों हम पसंद थे उस की
    उन दिनों ला-जवाब होते थे

    यूँ न कर अब हमें नज़र-अंदाज़
    हम कभी तेरा ख़्वाब होते थे

    बस वही आए औरतों को पसंद
    मर्द जो कामयाब होते थे

    उस की आँखों में थे वो मंज़र जो
    देखने से ख़राब होते थे
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    कर नहीं सकता वक़्त की चोरी
    करता रहता है जो घड़ी चोरी

    कर गया उस से बेवफ़ाई कोई
    चोर के घर में हो गई चोरी

    इस को तो हुस्न का हुनर कहिए
    दिल चुराना नहीं कोई चोरी

    मौत का नाम दे के दुनिया से
    ख़ुदा करता है आदमी चोरी

    मेरा ग़म भी चुरा सकेगा क्या
    जिस ने की मेरी शाइरी चोरी
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    देखना होता है उस ने भी मेरी जानिब तब
    मेरा जब उस की तरफ़ ध्यान नहीं होता है

    यार उस शख़्स की आँखें ही चली जाएँ फिर
    जो उसे देख के हैरान नहीं होता है
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    मोहब्बत का दिखावा कर रहा हूँ
    तुम्हारे साथ धोखा कर रहा हूँ

    ये चौथा दिल है जिस में घर किया है
    मगर मैं इश्क़ पहला कर रहा हूँ

    यूँ आए दिन नए लोगों से मिल कर
    मैं ख़ुद को और तन्हा कर रहा हूँ

    नहीं कर पाया दुनिया दिल के जैसी
    सो दिल को दुनिया जैसा कर रहा हूँ
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