SHABAN NAZIR

Top 10 of SHABAN NAZIR

    क्या मिला खफ़ा हो के
    मुझ से यूँ जुदा हो के

    मुझ को मैं ने ढूँढा है
    ख़ुद ही लापता हो के

    क़ैद में रहा ज़िंदा
    मर गया रिहा हो के

    मैं वजूद में आया
    तुझ में ही फ़ना हो के

    दर्द हो गया उर्यां
    मुझ में ला दवा हो के

    ख़ुद की मंज़िलें ढूँढी
    तेरा रास्ता हो के

    हम बहुत हुए रुसवा
    तुझ से आशना हो के
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    कहाँ किसी को कभी दिखे हैं उदास चेहरे
    तमाम चेहरों में छिप गए हैं उदास चेहरे

    ये ख़ुश-ख़िसाली का बस नहीं है समझ ले मुझ को
    मिरी उदासी समझ रहे हैं उदास चेहरे

    उदास होना बुरा नहीं है ये ख़ूब समझो
    यक़ीन जानो नहीं बुरे हैं उदास चेहरे

    भले हज़ारों पहन के आओ नए मुखौटे
    मिरी नज़र से नहीं छिपे हैं उदास चेहरे

    कभी जो खुल कर के रो लिए थे वो आज ख़ुश हैं
    मगर जो चुप थे वो बन चुके हैं उदास चेहरे

    ये बात सच है बुझे-बुझे हैं हसीन चेहरे
    मगर ये क्या है खिले-खिले हैं उदास चेहरे
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    तुम ने हमें भुला दिया अच्छा किया
    अहल-ए-सुख़न बना दिया अच्छा किया

    तुम दूर जा रहे ख़बर अच्छी नहीं
    लेकिन हमें बता दिया अच्छा किया

    हम को यक़ीन था तुम्हारे साथ पर
    तुम ने भी मशवरा दिया अच्छा किया

    पंछी क़फ़स में क़ैद था कुछ सोच के
    तुम ने अगर उड़ा दिया अच्छा किया

    ख़त दे दिया तुम्हें मगर बेचैन हूँ
    पढ़ कर अगर जला दिया अच्छा किया

    पहले सुकून से किया इज़हार पर
    इक शोर भी मचा दिया अच्छा किया
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    क़फ़स से पर कटे पंछी रिहा करने से क्या होगा
    दिलों की ख़ुद-कुशी कर के दवा करने से क्या होगा

    ज़रा तहक़ीक़ की मैं ने मेरे हक़ में जफ़ा निकली
    तुम्हीं बोलो मेरे हक़ में वफ़ा करने से क्या होगा

    मेरे ग़म के चराग़ों को बुझा पाया न तूफाँ भी
    तेरे इस अदना दामन के हवा करने से क्या होगा

    ये क्या अच्छा नहीं हो अब की हम मंज़िल अलग कर लें
    सफ़र के बीच में रस्ता जुदा करने से क्या होगा

    चलो फिर सिलसिला मिलने का आख़िर ख़त्म कर लें हम
    ये आए दिन मुलाक़ातें क़ज़ा करने से क्या होगा

    अभी कुछ लोग हैं नाज़िर सफ़र में काम आएँगे
    फ़क़त अपने लिए तन्हा दुआ करने से क्या होगा
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    "याद"
    यक़ीनन तुम भी मेरे बारे कभी सोचते होगे
    भले ही इक भटकती मुख़्तसर सी याद आ जाए
    कभी बीते हुए लम्हात की एक ख़ुशनुमा झलकी
    किसी दिन ख़्वाब के रस्ते अचानक सामने आए
    कभी ऐसा भी होता हो कि मेरी शा'इरी को तुम
    हमारी याद में खो कर उसे तन्हा जो पढ़ते हो
    तो उन अल्फ़ाज़ से मेरी कभी आवाज़ आती हो
    तुम्हारी लब- कुशाई होती है जब मेरी ग़ज़लों से
    यक़ीं जानो तो मुझ को ये मालूम होता है
    तुम्हारे लब पे आ जाने का ये अच्छा तरीक़ा है
    वहीं से फूल की मानिंद तुम्हारे लब से झड़ता हूँ
    कि जैसे फूल झड़ते हैं तुम्हारे बात करने से
    मगर मैं सोचता हूँ फूल हूँ तो फूल कैसा हूँ
    मिरी जाँ कुछ तो गुल ज़ेर-ए- चमन ऐसे भी होते हैं
    कि जो ख़ुशबू नहीं देते मगर दिल-कश भी होते हैं
    उन्हीं दिलकश नज़ारों का मैं इक ऐसा हिस्सा हूँ
    कि जो ख़ुशबू तो देता है मगर दिलकश नहीं होता
    मगर अफ़सोस है कि ज़िन्दगी कुछ और ही शय है
    इसे ख़ुशबू परस्ती का दिखावा ख़ूब आता है
    मुक़ाबिल दिल-कशी के सामने ख़ुशबू-परस्ती हो
    यक़ीनन ज़िंदगी भी हो न हो दिलकश को चुनती है
    ज़रा सी देर में ही मैं भी क्या-क्या सोच लेता हूँ
    मैं तुम को याद कर के ये अक्सर सोचता हूँ बस
    न पूरे दिन न पूरी रात भले ही चंद से लम्हात
    यक़ीनन तुम भी मेरे बारे कभी सोचते होगे।
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    गुज़िश्ता ज़िन्दगी के सारे ही हालात लिख बैठा
    ख़्याल-ए-यार में आ कर मैं सब जज़्बात लिख बैठा

    किसी के दर्द से वाक़िफ़ नहीं हूँ फिर भी जाने क्यूँ
    मैं अपनी बात के बाइस सभी की बात लिख बैठा

    मुहब्बत है यही यारों यही अंजाम है इस का
    मैं अपनी जीत के क़िस्से सुनाकर मात लिख बैठा

    ख़यालों में तिरे गेसू क़लम में है तिरा काजल
    तसव्वुर में अमावस की अँधेरी रात लिख बैठा

    मुझे मालूम ही क्या था ख़िज़ाँ पे बात करनी थी
    तुम्हें देखा तो मैं भी दफ़ 'अतन बरसात लिख बैठा
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    प्यार भी हो प्यार का अंजाम भी हो
    साथ तेरे चाय उस पर शाम भी हो

    क्या पता क्या है मगर कुछ बात तो है
    क्या पता इस कुछ का कोई नाम भी हो

    इतनी भी मसरूफ़ियत अच्छी नहीं है
    वो बुलाए और मुझ को काम भी हो

    ज़िन्दगी भी मौत को चुनती है आख़िर
    हर कोई ये चाहता आराम भी हो

    तब कहीं जा कर मुहब्बत रंग लाए
    एक राधा हो तो दूजा श्याम भी हो


    ज़िन्दगी तेरी सज़ा मंज़ूर है पर

    शर्त ये है मुझ पे इक इल्ज़ाम भी हो
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    ये सोच कर हम प्यार में आए
    रुतबा मेरा दो चार में आए

    मसरूफ़ियत में चूर है दुनिया
    हम तो यहाँ बेकार में आए

    पूरे जहाँ में धूम कर डाली
    जब सरफिरे किरदार में आए

    आवाज़ हक़ की जिन गलों से थी
    वो ही गले तो दार में आए

    बर्बाद हम को जिस ने कर डाला
    क्यूँ याद वो हर बार में आए
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    ए जान ज़रा बचकर ही रहना
    हम बद-नज़रों की बद-नज़री से
    क्या तुम को ख़बर है क्या होता है
    क्या तुम को गुमाँ तुम क्या होते हो
    जब ज़ुल्फ़ तुम्हारे रुख़सारों पर
    इक बार परेशाँ हो जाती है
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