क़फ़स से पर कटे पंछी रिहा करने से क्या होगा

दिलों की ख़ुद-कुशी कर के दवा करने से क्या होगा

ज़रा तहक़ीक़ की मैं ने मेरे हक़ में जफ़ा निकली
तुम्हीं बोलो मेरे हक़ में वफ़ा करने से क्या होगा

मेरे ग़म के चराग़ों को बुझा पाया न तूफाँ भी
तेरे इस अदना दामन के हवा करने से क्या होगा

ये क्या अच्छा नहीं हो अब की हम मंज़िल अलग कर लें
सफ़र के बीच में रस्ता जुदा करने से क्या होगा

चलो फिर सिलसिला मिलने का आख़िर ख़त्म कर लें हम
ये आए दिन मुलाक़ातें क़ज़ा करने से क्या होगा

अभी कुछ लोग हैं नाज़िर सफ़र में काम आएँगे
फ़क़त अपने लिए तन्हा दुआ करने से क्या होगा

— SHABAN NAZIR

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