तीरगी को रौशनी से मारिए
दुश्मनी को दोस्ती से मारिए
हम तुम्हारे चाहने वालों में थे
हम को थोड़ा आजिज़ी से मारिए
आप को क्या है ज़रूरत तेग़ की
आप तो बस बेरुख़ी से मारिए
हर हसीना की यही तरकीब है
हर किसी को दिल-लगी से मारिए
ये जो सारे दुश्मनान-ए-इश्क़ हैं
इन सभी को आशिक़ी से मारिए
बच गए हों रहज़नी से जो बशर
उन को तो बस रहबरी से मारिए
— SHABAN NAZIR















