सफ़र में साथ आओगे तो समझोगे
कहीं पर मात खाओगे तो समझोगे
किसी को याद रखने के सफ़र में तुम
किसी को भूल जाओगे तो समझोगे
यहाँ जीने का इक फ़न है नहीं समझे
ग़मों में मुस्कराओगे तो समझोगे
हमारे शहर में उड़ना मना क्यूँ है
परों को फड़फड़ाओगे तो समझोगे
भला कैसे कोई खोता है आँखों में
कभी नज़रें मिलाओगे तो समझोगे
— SHABAN NAZIR















