ये दुनिया कुछ नहीं प्यारे फ़क़त दो पल की लगती है
यहाँ से आज तक जो भी फ़राहम है सो मिट्टी है
मैं उर्दू में ग़ज़ल कह ही रहा था और फिर इक शख़्स
सर-ए-महफ़िल खड़ा होकर के बोला ये तो हिन्दी है
तुझे जब पा लिया मैं ने तो ये अफ़सुर्दगी कैसी
न जाने क्या है अब बाक़ी न जाने क्या कमी सी है
ग़म-ए-फ़ुर्क़त कभी है तो कभी पैहम ही बेज़ारी
कि जैसे अब तिरी मुझ को ज़रूरत है नहीं भी है
तुम्हें तो भूलना जैसे तो फिर भी ऐन मुमकिन था
भले ही ऐन मुमकिन हो मगर मुझ पे जो बीती है
— SHABAN NAZIR















