तुझ को जब याद कर रहे थे हम

ख़ुद को आबाद कर रहे थे हम

बारहा तुझ से दूर जा कर के
तेरी इमदाद कर रहे थे हम

एक दूजे को वक़्त दे कर के
वक़्त बर्बाद कर रहे थे हम

हम असीरी में पड़ गए आख़िर
किस को आज़ाद कर रहे थे हम

हम को भटका दिया है मक़सद से
कुछ तो ईजाद कर रहे थे हम

— SHABAN NAZIR

More by SHABAN NAZIR

Other ghazal from the same pen

See all from SHABAN NAZIR →

Manzil Shayari

Shers of manzil.

All Manzil Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling