दौलतें लुट गईं पर जज़ा तो नहीं

लोग रूठे हैं तो क्या ख़ुदा तो नहीं

क्यूँ रहे साथ में क्यूँ ज़रूरी हो तुम
हुस्नपरवर सही हौसला तो नहीं

क्यूँ तवक़्क़ो करें सच ही बोलें सभी
अब यहाँ हर कोई आइना तो नहीं

आज भी आप मुझ से करें दिल-लगी
आज भी आप को रोकता तो नहीं

क्या ज़रूरत है मुझ को कि दूँ मैं सबूत
साथ देता हूँ मैं मशवरा तो नहीं

इस गुनाह की यक़ीनन सज़ा पाऊँगा
ये हिदायत कोई फ़ैसला तो नहीं

आप मुझ से हैं क्यूँ कर पशेमाँ हनूज़
मैं तो ख़ामोश हूँ बा-गिला तो नहीं

— SHABAN NAZIR

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