ग़म-ए-हयात में यूँँ ढह गया नसीब का घरकि जैसे बाढ़ में डूबा हुआ गरीब का घरवबायें आती गईं और लोग मरते गएहमारे गाँव में था ही नहीं तबीब का घर— Ashraf Ali