"याद"

यक़ीनन तुम भी मेरे बारे कभी सोचते होगे
भले ही इक भटकती मुख़्तसर सी याद आ जाए
कभी बीते हुए लम्हात की एक ख़ुशनुमा झलकी
किसी दिन ख़्वाब के रस्ते अचानक सामने आए
कभी ऐसा भी होता हो कि मेरी शा'इरी को तुम
हमारी याद में खो कर उसे तन्हा जो पढ़ते हो
तो उन अल्फ़ाज़ से मेरी कभी आवाज़ आती हो
तुम्हारी लब- कुशाई होती है जब मेरी ग़ज़लों से
यक़ीं जानो तो मुझ को ये मालूम होता है
तुम्हारे लब पे आ जाने का ये अच्छा तरीक़ा है
वहीं से फूल की मानिंद तुम्हारे लब से झड़ता हूँ
कि जैसे फूल झड़ते हैं तुम्हारे बात करने से
मगर मैं सोचता हूँ फूल हूँ तो फूल कैसा हूँ
मिरी जाँ कुछ तो गुल ज़ेर-ए- चमन ऐसे भी होते हैं
कि जो ख़ुशबू नहीं देते मगर दिल-कश भी होते हैं
उन्हीं दिलकश नज़ारों का मैं इक ऐसा हिस्सा हूँ
कि जो ख़ुशबू तो देता है मगर दिलकश नहीं होता
मगर अफ़सोस है कि ज़िन्दगी कुछ और ही शय है
इसे ख़ुशबू परस्ती का दिखावा ख़ूब आता है
मुक़ाबिल दिल-कशी के सामने ख़ुशबू-परस्ती हो
यक़ीनन ज़िंदगी भी हो न हो दिलकश को चुनती है
ज़रा सी देर में ही मैं भी क्या-क्या सोच लेता हूँ
मैं तुम को याद कर के ये अक्सर सोचता हूँ बस
न पूरे दिन न पूरी रात भले ही चंद से लम्हात
यक़ीनन तुम भी मेरे बारे कभी सोचते होगे।

— SHABAN NAZIR

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