Om Shukla

Om Shukla

@enthusiast_om

Om Shukla shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Om Shukla's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

5

Content

39

Likes

99

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

Sher

ख़ुद के साथ दिल अब इतनी तो मुरव्वत करना कुछ भी हो जाए मगर अब न मोहब्बत करना — Om Shukla
उदासी से मेरी बनती बहुत है मगर ये राब्ता अच्छा नहीं है — Om Shukla
यही तो मसअला है ना तुम्हारे दूर जाने पे तुम्हारे ख़्वाब आएँगे, तुम्हारी याद आएगी — Om Shukla
नदी में मछुआरे सा यूँँ जाल न रखो सुनो, तुम मेरा झूठा ख़याल न रखो — Om Shukla
मैं ने उस के ख़्वाब तक थे देख डाले उस से मेरी आँख तक देखी न गई — Om Shukla
मुझ सेे भी अच्छी लड़कियाँ हैं इस जमाने में प्यासे को दरिया दीजे, समुंदर न दीजिये — Om Shukla
वो गर दरिया था तो बहा क्यूँ नहीं थी उस को मोहब्बत तो कहा क्यूँ नहीं — Om Shukla
अब तो मैं बिल्कुल नहीं ठहरने वाला अब चला चल ये मेरी अना ने कहा है — Om Shukla
एक जमाने बा'द आई गाँव में बिजली पहले उस ने छत पर झुमके टाँगे थे — Om Shukla
झाँको मत इस दिल में ये वीरान पड़ा है ख़ाली घर है, कौन भला रहता होगा — Om Shukla
कई चेहरे हैं मेरे माज़ी से जाने किस को रो रहा हूँ मैं — Om Shukla
साथ नहीं छोड़ा है अब तक तुम सेे अच्छी तन्हाई है — Om Shukla
पेशानी को चूमो मेरे, बालों को सहलाओ ना अकेले मैं मर जाऊँगा, अब तो वापस आओ ना — Om Shukla
मैं पहाड़ हूँ एक जगह पे रुका हुआ वो कैलेंडर है, तारीख बदलती रहती है — Om Shukla
इश्क़ करो तो डूब के जानाँ दरिया की रफ्तार न पूछों — Om Shukla
अब तो पास मेरे कुछ भी मुस्कराने को नहीं अब के गर गया फिर मैं लौट आने को नहीं — Om Shukla
ये और बात अकेले काट नहीं सकता दोस्त लेकिन मैं किसी से बाँट नहीं सकता दोस्त — Om Shukla

Ghazal

बेमलतब की बातों पर इतना ग़ुस्सा ठीक नहीं उदासी तो चल जाती है,लेकिन रोना ठीक नहीं ख़ुशियाँ सारी खा जाएगी,दे जाएगी ढेरो ग़म सोच के करना जब भी करना,प्यार वगैरा ठीक नहीं आए वो और फूल पर बैठे , तुम उधेड़ दो पीठ यार मेरे उस तितली को ऐसे बहकाना ठीक नहीं उस ने मेरी नाव डुबोई, उस से ही सीखी तैराकी मैं आख़िर ये कैसे कह दूँ कि वो दरिया ठीक नहीं साथ तेरे रहते हैं लोग लेकिन करते नहीं मुहब्बत या'नी लड़का ठीक तो है, लेकिन ज़्यादा ठीक नहीं कब तक गैरों का ग़म, ढोवोगे काँधे पर 'ओम' तुम को ही खा जाएगी ये, ऐसा करना ठीक नहीं — Om Shukla

Nazm

"जंग" एक जंग जो हम ने शुरू की एक रोज़ माजी की याद में मन के बयाबान के किसी शजर की डालियों के टूट कर रगड़ने से सुलगी हुई चिंगारी से किसी टापू पर बसाए गए शहरों की ऊँची बालकनियों से मुहब्बत से बने पुल के टूटे हुए मेहराब पर बैठी तितलियों से पुरानी किताब के मुड़े हुए पन्ने के कोने पर लिखी तारीखों से उन तकलीफ़ों से जो तेरी कमी के बा'द मेरे सीने पर पहाड़ बन गई हैं उन सभी सायों से जो कभी थे ही नहीं,लेकिन मैं ने महसूस किया है उन सिलवटो से जो दालान में पड़ी चारपाई के बिस्तरे पर सिमटी हुई हैं उन आँखों से जिन में कोई झील नहीं,लेकिन भरी रहती हैं उस चाय की दुकान से जहाँ पर न जाने कितने मिट्टी के कपों को हम ने तुम्हारे होंठ समझ कर चूमा है उन सभी गजलों से जिन को तुम्हें याद कर के लिखा है उस बलिश्त से जिस को अपने सिरहाने रख कर सोए हैं,रोए हैं उन परिंदों से जिन्हें हम ने साथ में बैठ कर दाने खिलाये हैं उस गुलाब से जिस की पंखुड़ियों की महक तुम्हारे जिस्म से आती रही है और शाम को पौने सात बजे तुम्हारे शहर जाती उस ट्रेन से भी जंग शायद सब सही कर दे,मुहब्बत ने तो लगभग नेस्तनाबूद कर दिया है हम तुम्हारी याद के हुक्के को पिएँगे और अपने होंठों से उदासी का धुआँ फूंकते रहेंगे — Om Shukla
मुंतजिर तुम कहती थी मुहब्बत की डगर जंग की है और मैं ने कहा था हम आख़िर तक साथ चलेंगे तुम ने कहा था जमाना काबिज है हम पे और मैं ने भी कहा था ये सारे हाथ मलेंगे तुम कहती थी रातें आजकल उदास हैं मैं कहता था अँधेरा मुहब्बत बांटता है तुम कहती थी इश्क़ सुकून देता है बहुत, मैं ने बताया था नाजुक वक़्त पर काटता है तुम कहती थी तुम एक रोज़ चली जाओगी, मैं कहता था मुन्तजिर रहूँगा आख़िर तक मैं तुम कहती थी नहीं मिलूंगी तो क्या करोगे मैं कहता था जाऊँगा उस साहिर तक मैं और फिर एक दिन चली गई तुम जैसे कोई टूटता तारा चला जाता है तुम्हीं आ कर बताओ ना यार ख़ुद को क्या ऐसे छला जाता है ये फिसलती रेत सी सिरहन ताबूत लगती है मेरी उदासी मुझ सेे भी मजबूत लगती है। किसी सम्त निकल जाऊँगा किसी रोज़ किसी जहान में बुलाऊँगा किसी रोज़ क्या तय किया ये तब बताना तुम, मर जाऊँ उस से पहले एक बार आना तुम नहीं आई तो ख़ुद से क्या कहूंगा आना जरूर मुंतजिर रहूँगा — Om Shukla
"हिज्र में मारी गईं नज़्में" सर्द रात में आँखों पर पड़ी ओस से उतारी गई नज़्में सिसकती हैं,चीख़ती हैं ,हिज्र में मारी गई नज़्में तुम तक अब आवाज नहीं जाती मेरी तुम तक अब मेरे ख़त भी नहीं जाते हैं ये साए,ये अलमारियाँ,ये किताबें,ये कमरा लौट आओ ना,सब तुम्हें बुलाते हैं तेरे गालों पर मेरे हाथ हुआ करते थे सुबह-ओ-शाम हम साथ हुआ करते थे अब तन्हाई सिरहाने बैठ जाती है तुम्हारी याद यकायक आ ही जाती है एक क़िस्सा है जिस का छोर नहीं पाता हूँ रोना छोड़ दिया है,बे-सबब मुस्कराता हूँ एक चेहरा है जिसे भूल नहीं पाऊँगा एक चेहरे पर मैं कितनी नज़्म गाऊँगा! एक उम्मीद है तेरे लौट आने की मगर ये माजी तो मेरी जान लिए जाता है तेरा नाम लिखना और मिटाना रेत से इस का सिवा मुझे कुछ और कहाँ आता है धूप भी नहीं आती है दरीचों से रेत भी अब ख़त्म है सेहराओं से मन बोझिल सा,परेशान सा है तेरी याद रिसती है मेरे घावों से कोई है जो मेरा हाथ पकड़ने को है बेवजह की बात पर मुझ सेे लड़ने को है तू बता तेरी जगह कैसे दे दूँ अपना हिस्सा ख़ुद ही कैसे खो दूँ तू बता तू लौट कर आएगा ना? तू बता मेरी नज़्म तू गायेगा ना? कुछ गैर ज़रूरी बातें तुझ सेे करनी है तेरी मोहब्बत से अपनी कब्र भरनी है ये मौसम मुझे कितना अजीज था इक वक़्त तू मेरे कितना क़रीब था मुहब्बत से लड़ाई! हार जाएगा मुझे मालूम है! तू न आएगा! सर्द रात में आँखों पर पड़ी ओस से उतारी गई नज़्में सिसकती हैं,चीख़ती हैं ,हिज्र में मारी गई नज़्में — Om Shukla
"नहीं मिलेगी" ख़ुद को भले निसार कर लो चाहे जितना प्यार कर लो साँसे भी तुम उधार कर लो बहता दरिया पार कर लो फिर भी मुहब्बत करते हो जिस से तुम्हें वो लड़की नहीं मिलेगी कोई जादुई किताब पढ़ लो रब से चाहे जितना लड़ लो कोई ऊँचा पहाड़ चढ़ लो मन में कितने ही स्वप्न गढ़ लो फिर भी मुहब्बत करते हो जिस से तुम्हें वो लड़की नहीं मिलेगी भले ही अपने ख़्वाब नोचो या फिर कोई लम्हा दबोचो देर रात तक उस को सोंचो उस के लिए अपना वक़्त बेचो फिर भी मुहब्बत करते हो जिस से तुम्हें वो लड़की नहीं मिलेगी ख़ुद पर भले सितम कर लो अपनी आँख भी नम कर लो अपने दायरे कम कर लो अपने हिस्से ग़म कर लो फिर भी मुहब्बत करते हो जिस से तुम्हें वो लड़की नहीं मिलेगी भले ही इश्क़ को अजीब मानो हर किसी को रकीब मानो उस को अपने क़रीब मानो बेहतर अपना नसीब मानो फिर भी मुहब्बत करते हो जिस से तुम्हें वो लड़की नहीं मिलेगी जियोगे तुम इक अज़ाब ले कर सिर्फ़ उस का ख़्वाब ले कर हर लम्हे का हिसाब ले कर चेहरे पर इक नकाब ले कर फिर भी मुहब्बत करते हो जिस से तुम्हें वो लड़की नहीं मिलेगी — Om Shukla
"इख़लास" मेरे दिल की सम्त बड़ा शोर रहा उतार दी मैं ने भी इश्क़ की पैरहन फिर मेरे ख़्वाब भी दानिश्ता फीकें पड़े मेरी आँखें भी बराबर समुंदर हुईं मैं ने अक्सर सोचा था अज़ल तक चाहूँगा आब-ए- चश्म ने ये अरमान भी तोड़ा मेरा फिर भी किसी शब जो तुम बुलाओ अगर देकर के थपकियाँ मुझे सुलाओ अगर यक़ीनन लौट आऊँगा रौशनी बनकर तुम्हारे बदन की सिलवट पर चाँदनी बनकर तुम्हें भी लौटने का एजाज़ रहे मगर हाँ ये तजुर्बा सिर्फ़ राज रहे किसी रोज़ तुझ सेे ढेर सारी गुफ़्तगू हो तुरपाइयाँ जितनी हों सब रफू हों तू भी आगे से न कोई चाल चले जुगनू चमके और चराग़ जले एक दूसरे की ख़ातिर बस जुस्तजू हो मैं भी रहूँ,तू भी रहे और सुकूँ हो — Om Shukla