"इख़लास"

मेरे दिल की सम्त बड़ा शोर रहा
उतार दी मैं ने भी इश्क़ की पैरहन फिर
मेरे ख़्वाब भी दानिश्ता फीकें पड़े
मेरी आँखें भी बराबर समुंदर हुईं
मैं ने अक्सर सोचा था अज़ल तक चाहूँगा
आब-ए- चश्म ने ये अरमान भी तोड़ा मेरा
फिर भी किसी शब जो तुम बुलाओ अगर
देकर के थपकियाँ मुझे सुलाओ अगर
यक़ीनन लौट आऊँगा रौशनी बनकर
तुम्हारे बदन की सिलवट पर चाँदनी बनकर
तुम्हें भी लौटने का एजाज़ रहे
मगर हाँ ये तजुर्बा सिर्फ़ राज रहे
किसी रोज़ तुझ से ढेर सारी गुफ़्तगू हो
तुरपाइयाँ जितनी हों सब रफू हों
तू भी आगे से न कोई चाल चले
जुगनू चमके और चराग़ जले
एक दूसरे की ख़ातिर बस जुस्तजू हो
मैं भी रहूँ,तू भी रहे और सुकूँ हो

— Om Shukla

More by Om Shukla

Other nazm from the same pen

See all from Om Shukla →

Samundar Shayari

Shers of samundar.

All Samundar Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling