"हमारा बदन"

उस के आईने में निहारा हमनें अपना बदन
इक उदास शब में सँवारा हमनें अपना बदन

अब मोहब्बत उस को कोई भी ता'ल्लुक नहीं
उस की सिलवट पर उतारा हमनें अपना बदन

कश्तियाँ आती हैं लंगर डालने और जाती हैं
बना लिया नदी का किनारा हमनें अपना बदन

इश्क़ विश्क़ का माजरा कहाँ पता था पहले हमें
छलनी कर लिया है सारा हमनें अपना बदन

जब इल्म, मोहब्बत, फ़िक्र रास न आई सब को
कर दिया है नीलाम दोबारा हमनें अपना बदन

— Om Shukla

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