मुफलिसी के मारे हम
जाएँ किस चौबारे हम
अपनी ख़ुशियाँ, जिम्मेदारी
पहले किसे सवारें हम
चादर न हो तो बतलाओ
कितना पाँव पसारे हम
दुनिया चाहे जो भी कह ले
माँ की आँख के तारे हम
मन मँझधार सा चंचल है
हैं ठहरे हुए किनारे हम
— Om Shukla
जाएँ किस चौबारे हम
अपनी ख़ुशियाँ, जिम्मेदारी
पहले किसे सवारें हम
चादर न हो तो बतलाओ
कितना पाँव पसारे हम
दुनिया चाहे जो भी कह ले
माँ की आँख के तारे हम
मन मँझधार सा चंचल है
हैं ठहरे हुए किनारे हम
Other ghazal from the same pen
Shers of dillagi.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling