आ गया है उस की ज़िंदगी में और कोई
तन्हाई मुस्तक़िल, आरिज़ी में और कोई
अपने साथ हम ने लम्बा सफ़र काटा है
हम को न मिला मुफ़लिसी में और कोई
उस का इश्क़, इश्क़ नहीं है, तिजारत है
रौशनी में और कोई, तीरगी में और कोई
अपने बस का नहीं अब ये साँसे लेना
साथ देगा क्या? बेकसी में और कोई
उस के जाने पे परेशाँ हो तुम, हद है यार
गई तो आएगी ज़िंदगी में और कोई
— Om Shukla















