मुंतजिर

तुम कहती थी मुहब्बत की डगर जंग की है
और मैं ने कहा था हम आख़िर तक साथ चलेंगे
तुम ने कहा था जमाना काबिज है हम पे
और मैं ने भी कहा था ये सारे हाथ मलेंगे

तुम कहती थी रातें आजकल उदास हैं
मैं कहता था अँधेरा मुहब्बत बांटता है
तुम कहती थी इश्क़ सुकून देता है बहुत,
मैं ने बताया था नाजुक वक़्त पर काटता है

तुम कहती थी तुम एक रोज़ चली जाओगी,
मैं कहता था मुन्तजिर रहूँगा आख़िर तक मैं
तुम कहती थी नहीं मिलूंगी तो क्या करोगे
मैं कहता था जाऊँगा उस साहिर तक मैं

और फिर एक दिन चली गई तुम
जैसे कोई टूटता तारा चला जाता है
तुम्हीं आ कर बताओ ना यार
ख़ुद को क्या ऐसे छला जाता है

ये फिसलती रेत सी सिरहन ताबूत लगती है
मेरी उदासी मुझ से भी मजबूत लगती है।
किसी सम्त निकल जाऊँगा किसी रोज़
किसी जहान में बुलाऊँगा किसी रोज़
क्या तय किया ये तब बताना तुम,
मर जाऊँ उस से पहले एक बार आना तुम
नहीं आई तो ख़ुद से क्या कहूंगा
आना जरूर मुंतजिर रहूँगा

— Om Shukla

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