तुम बज्म में अब क़िस्से सुनाती रहना

मैं न रहूँगा अब यहाँ, मुस्कराती रहना

हुनर इक यही था मुझे रोके रखने का
फिक्र भले न करना, पर दिखाती रहना

मैं नहीं तुम से आजिज, तन्हाइयों से हूँ
तुम से कहता तो था, रोज़ आती रहना

सुन लो,ये दुनिया मेरे जैसी है ही नहीं
दानिश्ता ख़ुद को इस से बचाती रहना

— Om Shukla

More by Om Shukla

Other ghazal from the same pen

See all from Om Shukla →

Ghamand Shayari

Shers of ghamand.

All Ghamand Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling