बात को दिल में दबाए रखता हूँ
ऐसे मैं ख़ुद को सताए रखता हूँ
सब्ज़ क्यों करते हो ज़ख़्मों को मेरे
जब उन्हें मैं ही छुपाए रखता हूँ
ज़िंदगी की कश्ती यूँ चलती है अब
राब्ता ग़म से बनाए रखता हूँ
क्या तुम्हें मालूम हैं ख़ुद को फ़क़त
उसके अबरू से बचाए रखता हूँ
कर ली है फूलों ने मुझसे दूरियाँ
चाँद को जबसे रिझाए रखता हूँ
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