ग़ालिब की बातें तुम ज़रा सी ही मगर दिल से सुनो
    है ज़िंदगी को कैसे ग़ज़लों में उतारा ये सुनो

    हर लफ़्ज़ अपने में ज़माने को बयाँ करता लिखा
    ग़ालिब ने ग़ालिब को लिखा कितने क़रीने से सुनो
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    Lalit Mohan Joshi
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    बात को दिल में दबाए रखता हूँ
    ऐसे मैं ख़ुद को सताए रखता हूँ

    सब्ज़ क्यों करते हो ज़ख़्मों को मेरे
    जब उन्हें मैं ही छुपाए रखता हूँ

    ज़िंदगी की कश्ती यूँ चलती है अब
    राब्ता ग़म से बनाए रखता हूँ

    क्या तुम्हें मालूम हैं ख़ुद को फ़क़त
    उसके अबरू से बचाए रखता हूँ

    कर ली है फूलों ने मुझसे दूरियाँ
    चाँद को जबसे रिझाए रखता हूँ
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    Lalit Mohan Joshi
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    डोल ये ईमान जाए हम नहीं हरगिज़
    रहते हैं हम अपने वादों पे अटल यारों
    Lalit Mohan Joshi
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    आप हर शय में रहे मौज़ूद साईं
    दस दिशा आँखें रहे मौज़ूद साईं

    दर्द भी आता नहीं अब पास उसके
    जिसके हिस्से में रहे मौज़ूद साईं
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    Lalit Mohan Joshi
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    ऐ ख़ुदा अब नींद आँखों को अता कर दे
    थक गया हूँ अफ़्व मेरी सब ख़ता कर दे

    मर गया बच्चा तो अंदर उसके शायद इक
    ऐ ख़ुदा बूढ़े को फिर से अब फ़ता कर दे
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    Lalit Mohan Joshi
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    मुश्क आने मौत की मुझको लगी
    इश्क़ दुनिया करने ही मुझको लगी

    क्या कहूँ मैं ऐसी नादानी को अब
    प्यार में फिर छलने भी मुझको लगी
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    Lalit Mohan Joshi
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    दिल दुखाती बात है उसकी यक़ीनन
    ख़ाक होना जात है उसकी यक़ीनन

    मौत आएगी यहाँ सबकी सुनो पर
    इक यही तो मात है उसकी यक़ीनन

    यार तोड़ा है मिरा दिल हर किसी ने
    देख ये सौग़ात है उसकी यक़ीनन

    छाया है अब्र-ए-सियह अब अश्कों का फिर
    आँख से बरसात है उसकी यक़ीनन

    इक परिंदा क़ैद हो रक्खा था यारो
    यार ये इंसात है उसकी यक़ीनन
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    Lalit Mohan Joshi
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    अमावस रात देखो पूनम सी दिखती
    यक़ीनन वो जगी होगी मेरी ख़ातिर
    Lalit Mohan Joshi
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    रूह का जैसे मिलन होता ख़ुदा से है यहाँ
    वैसे बीमारी दुआ से ठीक होती हैं सभी
    Lalit Mohan Joshi
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    ये नज़रें मेरी उस पर यार अब रुक सी गई हैं
    सो अब सीने में मेरे वो धड़कना चाहती हैं
    Lalit Mohan Joshi
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