baat ko dil men dabaye rakhta hooñ | बात को दिल में दबाए रखता हूँ

  - Lalit Mohan Joshi

बात को दिल में दबाए रखता हूँ
ऐसे मैं ख़ुद को सताए रखता हूँ

सब्ज़ क्यूँ करते हो ज़ख़्मों को मेरे
जब उन्हें मैं ही छुपाए रखता हूँ

ज़िंदगी की कश्ती यूँँ चलती है अब
राब्ता ग़म से बनाए रखता हूँ

क्या तुम्हें मालूम हैं ख़ुद को फ़क़त
उसके अबरू से बचाए रखता हूँ

कर ली है फूलों ने मुझ सेे दूरियाँ
चाँद को जबसे रिझाए रखता हूँ

  - Lalit Mohan Joshi

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