zindagi ko main samajh kam pa raha hooñ | ज़िंदगी को मैं समझ कम पा रहा हूँ

  - Lalit Mohan Joshi

ज़िंदगी को मैं समझ कम पा रहा हूँ
मैं फ़क़त पागल हुए ही जा रहा हूँ

दुनिया में तो प्यार मिलता ख़ूब मुझको
मैं मगर उसके बिना आधा रहा हूँ

कर लिया इक ज़ुल्म जबसे रोज़ तबसे
मौत को मैं पास में बैठा रहा हूँ

याद आनी है नहीं उसको मेरी अब
क्यूँ दुआएँ रात दिन करता रहा हूँ

पास पानी का कुआँ है क्यूँ मगर फिर
बाद इसके भी ललित प्यासा रहा हूँ

  - Lalit Mohan Joshi

More by Lalit Mohan Joshi

As you were reading Shayari by Lalit Mohan Joshi

Similar Writers

our suggestion based on Lalit Mohan Joshi

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari