shahar ke ab shor se dar lagta hai | शहर के अब शोर से डर लगता है

  - Lalit Mohan Joshi

शहर के अब शोर से डर लगता है
हर कोई हमको सितमगर लगता है

ज़ख़्म ताज़ा पहले देता है यहाँ
फिर कहे वो अपना तो डर लगता है

चाँद जागा रातभर पूरी यहाँ
आज मानो चाँद बे-घर लगता है

जिस गली में हो मुकम्मल हर ग़ज़ल
उस गली का रोज़ चक्कर लगता है

जो बुलंदी पे पहुँच जाता यहाँ
सो वही दुनिया को ख़ुशतर लगता है

जीत से मेरी वो जलने वाले हाए
खेल से वो यार बाहर लगता है

मुश्किलों में है बचाया उसको फिर
गर ज़बाँ खोले तो बद-तर लगता है

साल बीते पाँच दिल्ली शहर में
ये बड़ा मुझको फ़ुसूँ-गर लगता है

ख़ुद-कुशी जो मुफ़्लिसी में कर गया
वो मगर लड़का सुख़न-वर लगता है

  - Lalit Mohan Joshi

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