शहर के अब शोर से डर लगता है
हर कोई हमको सितमगर लगता है
ज़ख़्म ताज़ा पहले देता है यहाँ
फिर कहे वो अपना तो डर लगता है
चाँद जागा रातभर पूरी यहाँ
आज मानो चाँद बे-घर लगता है
जिस गली में हो मुकम्मल हर ग़ज़ल
उस गली का रोज़ चक्कर लगता है
जो बुलंदी पे पहुँच जाता यहाँ
सो वही दुनिया को ख़ुशतर लगता है
जीत से मेरी वो जलने वाले हाए
खेल से वो यार बाहर लगता है
मुश्किलों में है बचाया उसको फिर
गर ज़बाँ खोले तो बद-तर लगता है
साल बीते पाँच दिल्ली शहर में
ये बड़ा मुझको फ़ुसूँ-गर लगता है
ख़ुद-कुशी जो मुफ़्लिसी में कर गया
वो मगर लड़का सुख़न-वर लगता है
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