Lalit Mohan Joshi

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Lalit Mohan Joshi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Lalit Mohan Joshi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कहो हमें भला बुरा या कुछ भी तुम यहाँ मगर कहे जो सच वो आइना भी पास हो — Lalit Mohan Joshi
ये नज़र जो है तुम्हारी लड़कियों पर यार वो भी तो किसी की बेटियाँ हैं — Lalit Mohan Joshi
सुनो यार ख़तरा वो अब टल गया मैं आख़िर जो उस के गले यूँँ लगा — Lalit Mohan Joshi
मैं ख़ुद से रूठा आप से हरगिज़ नहीं अब हिज्र से ही दोस्ती मेरी यहाँ — Lalit Mohan Joshi
पाप का इक मैं दरिया ही हूँ डूबकर आप तर जाइए — Lalit Mohan Joshi
बे-बहर जुमलों को ग़ज़ल कहते हो तुम हर्फ़-ए-ग़लत है ये तो मैं कहता रहा — Lalit Mohan Joshi
ज़बाँ मीठी रखो या तल्ख़ तुम मगर सच कहने की आदत रखो — Lalit Mohan Joshi
घुटन में जी रहा हूँ मैं बहुत कभी कोई समझ पाया नहीं — Lalit Mohan Joshi
मरा वो समझता है मुझ को मगर अब उसे जीत कर फिर दिखाना मुझे है — Lalit Mohan Joshi

Ghazal

चली बात घर घर कहानी कहानी हुआ इक सुख़न वर कहानी कहानी मेरा काम थोड़ा बहुत यार करना जताना बता कर कहानी कहानी रुलाने लगा है ये सारा ज़माना यही है मुक़द्दर कहानी कहानी दुआ है हमारी रहो ख़ुश सदा तुम हमें जागना पर कहानी कहानी सुनाते हैं चेहरे पे मुस्कान ला कर मगर दिल है पत्थर कहानी कहानी छुपा है ज़माने से सच्चा वो चेहरा बदलते हैं चाकर कहानी कहानी चलो अब मैं चुप ही रहूँ तो सही है सुनाऊँ न घर घर कहानी कहानी हमारी भी आँखों ने देखे थे सपने मगर टूटते पर कहानी कहानी वो सूनी सी चौखट वो ठहरी निगाहें अजब है ये मंज़र कहानी कहानी कभी रौशनी की दुआ की बहुत थी अँधेरा हुआ घर कहानी कहानी जिसे हम ने ढूँढ़ा भटकते यहाँ पर मिला ख़ुद के भीतर कहानी कहानी नया फूल खिलता यहाँ यार कैसे किया जड़ को बे-घर कहानी कहानी मुक़द्दर की रेखा यही पूछती फिर कहाँ खो गया स्वर कहानी कहानी ललित ने है माना ख़ुदा शा'इरी को बना है वो शाइ'र कहानी कहानी — Lalit Mohan Joshi
इक खिला फूल मुरझा गया है यहाँ माँ के बच्चे को मारा गया है यहाँ शा'इरी को सहारा मिला ही नहीं बस उसे आज़माया गया है यहाँ पेड़ की छाँव से दोस्ती थी मगर धूप से घर बनाया गया है यहाँ बाग़ सूने हैं पत्ते भी ख़ामोश हैं खेल बच्चों का छीना गया है यहाँ राब्ते सब इमोजी में सिमटे हुए दौर कैसा मियाँ आ गया है यहाँ हाथ में फोन है मन उदासी भरा ये ग़ज़ब हाल देखा गया है यहाँ इक नदी रो रही थी यूँँ चुप-चाप से जैसे बच्चा रुलाया गया है यहाँ झील सूखी है जंगल भी वीरान है क्यूँ ज़मीं को मिटाया गया है यहाँ ज़िंदगी की हक़ीक़त ललित है यही हर क़दम पर गिराया गया है यहाँ ज़िंदगी यार अवसाद में है ललित रस्सी पंखा गले आ गया है यहाँ — Lalit Mohan Joshi
इक उदासी इस बदन को खा रही है ज़िंदगी ये ग़म कहाँ से ला रही है अजनबी सी हो गई ख़ुशियाँ मेरी अब अश्क आँखों से यहाँ छलका रही है दोस्त ने वा'दा किया था उम्रभर का दोस्ती पर आज़माती जा रही है वक़्त की शाखों से लटकी ये जवानी ये शज़र कमजोर करती जा रही है मैं ही ख़ुद में यार ग़ाफ़िल हो गया था अब ये दुनिया आइना दिख ला रही है उस ने जब छोड़ा बुरा मुझ को लगा पर फिर ये समझा ज़िंदगी समझा रही है डिग्रियाँ दीवार को है बस सजाती नौकरी इनसे कहाँ मिल पा रही है शा'इरी के अब तसव्वुर से निकल जा माँ की रोती आँख ये समझा रही है हो रही है अब 'ललित' के नाम दुनिया तू मगर दुनिया से मिटती जा रही है — Lalit Mohan Joshi
दुआ भी नहीं कोई हक़ में रही है मुझे मेरी क़िस्मत रुला कर गई है लगाया कभी दिल को मैं ने यहाँ जो मगर बे-वफ़ाई हमेशा मिली है गुलाबों को तुम ने तो महका दिया था जो फेरा है चेहरा वो ख़ुशबू गई है सफ़र ज़िंदगी का मुझे ख़ूब भाया मगर बस तुम्हारी कमी खल रही है न मन में है उलझन न कोई शिकायत तुम्हें खोया पाकर यही बस कमी है जिसे मैं समझता रहा था सहारा वही शाख़ आँधी में पहले गिरी है मैं तन्हा ही चलता रहा उम्र भर से ये दुनिया मगर मुझ सेे क्यूँ डर रही है जिसे मंदिरों की तरह पूजता था वो शाइ'र मुझे यूँँ बना कर गई है बुलंदी की ख़्वाहिश मुझे थी मगर अब कई रास्तों या'नी अड़चन मिली है वो कहती रही है सभी ठीक होगा मगर ये तसल्ली भी अब थक गई है वो माथा जो पटके ग़ज़ल यार बहती ग़ज़ल तो ललित के यूँँ ख़ूँ में रही है — Lalit Mohan Joshi
चलो घर को अपने अँधेरा हुआ है मेरे ख़्वाब का यूँँ तमाशा हुआ है यहाँ ज़ख़्म कितना ये गहरा हुआ है सो इक शख़्स ख़ुद से ही हारा हुआ है कभी दिल का जैसे वही था सहारा वही देखो फिर आज बदला हुआ है उसे ढूँढ़ता था मैं जिस आइने में वही जाने क्यूँ आज धुँधला हुआ है ज़माना हुआ इश्क़ की बात भूले मगर इश्क़ कैसे दुबारा हुआ है मेरा गाँव कितना सरल और प्यारा वही गाँव मुझ सेे जो छूटा हुआ है वो बचपन की गलियाँ मैं चाहूँ भटकना मगर अब वो बचपन पराया हुआ है अमावस में खोजा गया चाँद लेकिन फ़क़त मेरा रो कर गुज़ारा हुआ है समझता है ख़ुद को जो आगे 'ललित' से 'ललित' का उसी से किनारा हुआ है — Lalit Mohan Joshi
तुम ने कर ली यार अब शादी मुबारकबाद है हम हुए ग़म- ख़्वार अब शादी मुबारकबाद है सोचता हूँ दूर हो कर उस को क्या हासिल हुआ जब उसे था प्यार अब शादी मुबारकबाद है तुम किताबों से निकलकर दूर हम सेे हो गए हम हुए बेज़ार अब शादी मुबारकबाद है काँच जैसे टूट कर बिखरा बदन मेरा पड़ा तुम ही थे आधार अब शादी मुबारकबाद है राब्ते दिल तोड़ते हैं ये नई बातें नहीं रिश्ते हैं बाज़ार अब शादी मुबारकबाद है जो नहीं होना था सो वो हो गया तो ठीक है है ये क़िस्मत यार अब शादी मुबारकबाद है हर दुआ सजदे में माँगा ग़ैर की तुम हो गई छोड़ो ज़िक्र-ओ-ज़ार अब शादी मुबारकबाद है हम किताबें ओढ़कर बस फ़र्ज़ की चादर लिए हो कहाँ से प्यार अब शादी मुबारकबाद है यार जिस से घर सँभाले भी सँभलता था नहीं घर की है मुख़्तार अब शादी मुबारकबाद है क्या ग़लत था क्या सही था सोचते हैं प्यार में क्यूँ हुआ व्यापार अब शादी मुबारकबाद है तुम बसे दुनिया की रस्मों में किसी के साथ थे हम बने असरार अब शादी मुबारकबाद है हम ने जो देखे थे मिल के यार वो मंज़र यहाँ भूल बैठे यार अब शादी मुबारकबाद है दर्द अब रुकता नहीं लेकिन सताता भी नहीं जैसे हो इक यार अब शादी मुबारकबाद है अब किताबें और प्याली चाय रहती साथ में ख़ुद से है इज़हार अब शादी मुबारकबाद है ग़म भुलाकर यूँँ 'ललित' अपनी ग़ज़ल कहता रहा जैसे हो मय-ख़्वार अब शादी मुबारकबाद है — Lalit Mohan Joshi
नहीं अब वो मेरी अमानत नहीं है उसे मेरी अब तो ज़रूरत नहीं है तुम्हें गर मैं चाहूँ तो दिल से है चाहा मेरी कोशिशों में सियासत नहीं है सजाऊँगा फूलों से अपनी ग़ज़ल को हज़ाक़त यहीं है हिमाक़त नहीं है सुनो शे'र पढ़ कर न अंकुर बुलाया सही फिर तुम्हारी निज़ामत नहीं है न आँखों में जलवा न चेहरे पे रौनक़ गई जो मुहब्बत तो बरकत नहीं है पड़ी सिलवटें जो बदन में मेरे यूँँ पता गर तुम्हें हो शिकायत नहीं है मैं टूटा तो कोई सदा तक न आई करूँँ अब सदा मैं ये ताक़त नहीं है वो घर जो बनाए थे मिट्टी में हम ने कहाँ हैं ये पूछो तो फ़ुर्सत नहीं है हमें महफ़िलों में बुलाते नहीं हो ये अच्छी तो कोई शरारत नहीं है मुझे याद उस ने किया कॉल कर के मुझे ऐसे छल की ज़रूरत नहीं है वो ट्विटर पे रोया बहुत देर तक कल सियासत हुई थी हक़ीक़त नहीं है यहाँ दर्द बाँटे कोई ऐसा लाओ दवा से भी अब तो वो राहत नहीं है घरों के है रिश्ते लगे फ़ोन में है उन्हें बात करने की फ़ुर्सत नहीं है कहाँ आ गया और क्या देखता हूँ यहाँ जान की कोई क़ीमत नहीं है गले में हो रस्सी किसी वास्ते जो यहाँ मेरी ऐसी तो आदत नहीं है 'ललित' क्या करोगे यहाँ बीच रह कर तुम्हारी अगर कोई अज़मत नहीं है — Lalit Mohan Joshi
हम को दुनिया के आज़माने से पहले हम को रुकना है इस नज़ारे से पहले याद मेरी तुम को बहुत आएगी फिर तुम को बोला था मैं ने जाने से पहले जिस को चाहूँ वो रूह में ज़हर रक्खे काश वो कह देता पिलाने से पहले मैं ने तुम को जिस नज़्म में सब कहा था जा रहे हो तुम उस को सुनने से पहले मैं लुटा हूँ कितना मोहब्बत के रस्ते काश कोई समझे भुलाने से पहले वो ग़ज़ल में कहता रहा दर्द अपना डर रहा हूँ महफ़िल बुलाने से पहले ज़िन्दगी सब को है सिखाती यहाँ पर पढ़ लें ख़ुद भी थोड़ा सिखाने से पहले जब न मिलने की कोई उम्मीद बाक़ी फ़ैसला कर दो अब कि जाने से पहले तुम मुहब्बत को कोई हो खेल समझे टूटना पड़ता है निभाने से पहले मैं खड़ा हूँ ग़म के समुंदर किनारे देखना है मुझ को डुबाने से पहले हम सभी को इक रोज़ मिटना है यारो क्यूँ न सच बोले यार मिटने से पहले ज़ख़्म भी अब तो सब हमारे हमें ही कुछ सिखाते हैं चोट खाने से पहले काम होने का अपना इक वक़्त है तय सो नहीं होगा वक़्त आने से पहले हम फ़रिश्ता जिस को यहाँ मानते थे चल दिया वो रस्ता दिखाने से पहले घर किराए का और ख़र्चा दवा पर फिर उधारी सर है महीने से पहले फ़ोन पर ही पूछा गया हाल उस का बुझ गया चेहरा एक खिलने से पहले पहले शाइ'र ने इक ग़ज़ल को जिया फिर अब भटकता है वो सुनाने से पहले मीठे जुमलों में हैं छुपी साज़िशें सौ सोच लेते हैं हम ये हँसने से पहले इक घड़ी मैं ने सोच कर ये ख़रीदी जो बता देगी ग़म को आने से पहले इक दवा मुझ को चाहिए ज़ख़्म ख़ातिर ज़ख़्म भी भरना है वो बढ़ने से पहले दिल को पहले तो जिस्म को बा'द मारा बस बदन को ढोया यूँँ मरने से पहले ये सुख़न-वर बे-दर्द इक मौत पाए ये दुआ कर दो यार जाने से पहले जब से दफ़्तर में चेहरों के खोल देखे सब ललित से जलते हैं हँसने से पहले — Lalit Mohan Joshi
हर सहर उम्मीद से ख़ुद को जगाता हूँ शाम मायूसी में फिर मैं डूब जाता हूँ नौकरी ख़ातिर भटकता दर-ब-दर मैं तो रोज़ खालीपन मग़र मैं साथ लाता हूँ अब सभी नज़रें चुराते हैं यहाँ अपने इस लिए भी ग़म नहीं अपना सुनाता हूँ है लिबास-ए-काग़ज़ी ओढ़े मिरी क़िस्मत दफ़्तरों की बारिशों से भीग जाता हूँ इक परिंदा गाँव का वालिद से कहता है आप के बेटे की हालत देख आता हूँ गाँव में सबकी बसी थी जान मुझ में पर शहर आ कर ख़ुद को मैं बेजान पाता हूँ दफ़्तरों से ठोकरों का राब्ता हर रोज़ मैं वहाँ से बस उदासी साथ लाता हूँ नौकरी कर नौकरी का दर्द भी जाना बोझ को ढोते हुए ख़ुद रोज़ पाता हूँ देख कर बिखरे हुए अपने बदन को यार आँख होती नम यहाँ फिर टूट जाता हूँ — Lalit Mohan Joshi

Nazm

माँ शारदे हर्फ़ मुझ को दिए आपने शारदे मान रक्खा सदा आपने शारदे तम मिटाया मेरा शारदे आपने ज्ञान मुझ को दिया आपने शारदे जैसे पतवार बिन नाँव ख़ाली रही शारदे आप के बिन नहीं कुछ मेरा आपने ही सँभाला मुझे हर घड़ी धैर्य की छाँव मिलती रही शारदे हर्फ़ मुझ को दिए आपने शारदे मान रक्खा सदा आपने शारदे शब्द में भाव भरती हैं माँ शारदे शब्द को अर्थ भी दे दिए शारदे आपने स्वर दिए कंठ प्यारा लगा गीत भी आपने दे दिए शारदे हर्फ़ मुझ को दिए आपने शारदे मान रक्खा सदा आपने शारदे ले के कंपित सा मन डर के रहने लगा शून्य था मन मेरा मैं भटकता हुआ आप के वर ने मुझ को सँवारा यहाँ रौशनी से मेरे मन को रौशन किया हर्फ़ मुझ को दिए आपने शारदे मान रक्खा सदा आपने शारदे मुझ को सुर भी दिया अर मधुर भी किया भाव भी भर दिया मुझ को पूरा किया आपने मेरी ग़ज़लों में जीवन भरा और दुनिया में क़ाबिल ग़ज़ल-गो किया हर्फ़ मुझ को दिए आपने शारदे मान रक्खा सदा आपने शारदे — Lalit Mohan Joshi
हुक्मरान लूटा है मुफ़्लिसी भूख ने मेरे देश को लूटा है इन अमीरों ने मेरे देश को और डंके की चोट पर कहता हूँ मैं बदलते हुक्मरानों ने लूटा है मेरे देश को रोते बच्चे के हाथ में जैसे देते हैं खिलौना वैसे ये हुक्मरान चुप कराते हैं मेरे देश को कैसे कैसे प्रलोभन से अपने कुकर्म छुपाते हैं ये हुक्मरान ऐसे बहलाते फुसलाते हैं मेरे देश को झूठ इन के बिकते हैं सर-ए-बाज़ार में इस बाज़ार का हर दुकानदार डराता है मेरे को चुप हैं लब सी गए हैं ग़लत है सो ये ज़ख़्म पे ज़ख़्म देते हैं मेरे देश को सुना है चुनावी समय है चलो कुछ करते हैं सबब बताते हैं उन को जो आँख दिखाते हैं मेरे देश को — Lalit Mohan Joshi
नज़्म - वो क्या है उस की आँखें कैसी हैं उस की आँखें रब सी हैं उस की बातें कैसी हैं उस की बातें रौनक़ हैं उस की यादें कैसी हैं मेरी रातों जैसी हैं उस की यादें हिज्र है क्या ये फ़क़त बेकार किस ने बोली है उस का चेहरा कैसा है उस का चेहरा चाँद सा है उस की ज़ुल्फ़ें कैसी है उस की ज़ुल्फ़ें क़ाएनात है उस का साथ चलना क्या है मेरा आगे और आगे बढ़ना है उस की बिंदिया कैसी है माथे पर चाँद जैसी है उस का बोलना कैसा है सारे फ़ज़ा में फ़क़त प्यार ही घोलना है बाग़ में उस का होना कैसा है सारे फूलों को बस खिलना है उस सेे मुहब्बत किस को है उस सेे मुहब्बत सब को है जिस को उस ने चाहा है उस का मुक़द्दर रब ने लिक्खा है मेरी ग़ज़लें मेरी नज़्में क्या है उन के सारे हर्फ़ और सारे मिसरे उस पर है मेरी ग़ज़ल का मतला क्या है उस का चेहरा है शे'र के मिसरे क्या हैं उस की दो आँखें हैं ग़ज़ल का क़ाफ़िया क्या है क़ाफ़िया उस के लब हैं तो रदीफ़ क्या है वो उस की सुंदरता है बताओ फिर मक़्ता क्या है वो उस का दिल है उसपर क्या क्या जँचता है उस पर साड़ी सूट सब जँचता है उस के गाल में पड़ता वो गड्ढा देखो मुझ को दीवाना करता है उस का हुस्न तो है बहुत सुंदर रूह में उस के रब बसता है — Lalit Mohan Joshi
"मैं तुम्हें लिखना चाहता हूँ" मैं तुम्हें एक ख़्वाब लिखना चाहता हूँ मैं तुम्हें एक ख़याल लिखना चाहता हूँ तुम्हारे ज़ेहन में उठते हर सवाल का मैं तुम्हें हर जवाब लिखना चाहता हूँ वो आँखें वो होंठ वो गाल तुम्हारे सब को मैं कमाल लिखना चाहता हूँ वो तेरा नर्म लहजा और सख़्त मिज़ाज मैं हूँ उस पर क़ायल लिखना चाहता हूँ आँखों में मेरी दिखती ग़ज़ल हो तुम तुम्हारे माथे पे मतला तो होंठों पे मिसरे लिखना चाहता हूँ जिस दरख़्त की छाँव में बैठी तुम कुछ देर मैं उस दरख़्त की मिसाल लिखना चाहता हूँ उस दरख़्त को तू ने जो लिया आग़ोश में लिया है उस का मुक़द्दर कमाल लिखना चाहता हूँ मैं अल्मोड़ा से दिल्ली तलक घूमता रहा पर तेरे शहर को कमाल लिखना चाहता हूँ तुम हो अपने में अहल-ए-कमाल सो मैं तुम पर किताब लिखना चाहता हूँ — Lalit Mohan Joshi
"इक लड़की" ये पूरी दुनिया बहुत अच्छी लगती है जब वो लड़की रस्ता मेरा तकती है फिर ये दुनिया सारी अपनी लगती है जब प्यार से बाहों में वो लड़की भरती है और ये सारी दुनिया एक तरफ़ है या'नी बाक़ी एक तरफ़ वो लड़की है चेहरे की उस की मासूम वो हँसी जैसे मुझ को जीवन नया अता करती है फिर मुझ अधूरे से लड़के को साथ आ कर मेरे वो पूरा करती है सारे ख़्वाब भी पूरे होने लगते हैं जब मेरे साथ वो लड़की रहती है सच पूछो तो वो लड़की इस नादान लड़के को आ कर नादान से वो समझदार करती है उस प्यारी सी लड़की को मैं क्या कहूँ मेरी हर ग़ज़ल को वो मुकम्मल करती है वो लड़की मेरी ग़ज़ल के मतले से शुरू होकर शे'र क़ाफ़िया रदीफ़ से होकर मक़्ते पर रुकती है वो लड़की कभी बहर में तो कभी बिना बहर के भी ख़ूब-सूरत लगती है साथ में उस के चार क़दम बस चल पाऊँ मेरी ख़ुदा से बस यही दुआ रहती है — Lalit Mohan Joshi
"अश्क" अश्क तेरे हों या मेरे अश्क अश्क होते हैं अश्क का कोई न मज़हब होता है न कोई जात होती है अश्क अश्क होते हैं कभी ये सँभालते हैं तो कभी बिगाड़ते हैं ज़िंदा हैं तो अश्क हैं है बा'द मौत के भी अश्क शजर के अपने अश्क हैं शाख के भी अपने अश्क हैं फूल के अपने अश्क हैं कली के भी अपने अश्क हैं आँख के अपने अश्क हैं ज़ेहन के अपने अश्क हैं लब के अपने अश्क हैं दिल के भी कुछ अश्क हैं दरिया के अपने अश्क हैं समुंदर के अपने अश्क हैं माशूका के अपने अश्क हैं माशूक के अपने अश्क हैं राह चलते राही के अश्क हैं तवायफ़ के अपने अश्क हैं ज़ख़्म के अपने अश्क हैं तो मरहम के अपने अश्क हैं वफ़ा के अपने अश्क हैं बे-वफ़ा के भी अपने अश्क हैं मुफ़्लिसी के अपने अश्क हैं अमीरी के अपने अश्क हैं बिना बाम-ओ-दीवार के अश्क हैं तो बाम-ओ-दीवार में भी अश्क हैं बचपन के थोड़े अश्क हैं जवानी में ज़ियादा अश्क हैं बुढ़ापे तो अश्कों का अश्क हैं ज़रूरी नहीं ग़म के अश्क हैं ख़ुशी के अपने अश्क हैं — Lalit Mohan Joshi
"ज़िंदगी है क्या" बे-मन उम्र गुजारना ज़िंदगी है क्या रोज़ टूट कर बिखरना ज़िंदगी है क्या हम को रोज़ आकार हर कोई जीने लगता है और उस का आकार चले जाना ज़िंदगी है क्या ज़िंदगी कितना और सीखना है मुझ पर ये तेरा सितम ढाना ज़िंदगी है क्या दो वक़्त की रोटी के ख़ातिर हर दर पर हाथ फैलाना ज़िंदगी है क्या अगर तुम रखते हो ज़रूरी डिग्री-याफ़्ता तो एक भली नौकरी को तरसना ज़िंदगी है क्या मुसलसल ख़्वाबों के लिए जगना और उन ख़्वाबों का टूटना ज़िंदगी है क्या कुछ नए तजरबे सीखने के ख़ातिर अंगारों पे यूँँ रोज़ चलना ज़िंदगी है क्या जवानी के इस सुहाने सफ़र पर मोहब्बत के लिए दर बदर भटकना ज़िंदगी है क्या ये मसअला समझ आया ही नहीं चोट खाना और फिर सँभालना ज़िंदगी है क्या एक दो नंबरों के खेल में ख़ुद को तबाह करना ज़िंदगी है क्या जितना कम हुआ नंबरों का अंतर उतना नौकरी से दूर जाना ज़िंदगी है क्या गाँव से शहर आया था एक सुलझा लड़का उस का यहाँ उलझ कर रहना ज़िंदगी है क्या — Lalit Mohan Joshi
"ये ज़माने वाले कहाँ कब" ये ज़माने वाले कहाँ कब मुझ को याद करते हैं ये अपने किसी काम के सिलसिले में बात करते हैं अपनी ख़ुशियों में कहाँ ये मुझ को शामिल करते हैं ये बस अँधेरे से डरकर मुझ को याद करते हैं अपना हक़ जताने को हमेशा से आतुर दिखते हैं ये ज़माने वाले हैं जनाब बड़े बे-दर्द हुआ करते हैं रोना इनको किसी अपनी बात पे ही आता है वर्ना ये किसी के ग़म में कहाँ रोया करते हैं मैं ने जितनी दफ़ा ख़ुद को सँभाला इस ज़माने में ये सब उतनी दफ़ा ही मुझ को गिरा दिया करते हैं मैं न जाने किन लोगों के वास्ते रहता हूँ परेशान जो अक्सर मुझे परेशानियों में छोड़ दिया करते हैं — Lalit Mohan Joshi
पसीना बहाता चल पसीना अपने माथे से बहाता चल गीत अपनी जीत के यूँँ गाता चल मंज़िल परखती है तो परखने दे फिर भी रोज़ नया क़दम बढ़ाता चल वक़्त देगा अपने हिसाब से मगर हर रोज़ नई ग़ज़लें सुनाता चल बहर बे-बहर सब को भूल पहले तो ख़यालों के साथ ख़ुद को बहाता चल महफ़िल आज तेरे हक़ में नहीं है तो क्या मगर तू अपने दिलकश नज़ारे सुनाता चल आँधियों ने रास्ता कब किस का रोका है तू बस इनको अपना ठेंगा दिखाता चल सुब्ह इक रोज़ दर्द से तड़पा था मगर माँ की दुआ को यादकर ख़ुद को जगाता चल हिंदू मुस्लिम मंदिर मस्जिद क्या रक्खा है तू बस बेहतर ख़ुद को इंसान बनाता चल ख़ुदा ने क्यूँ भेजा है तुझ को यहाँ पता है तू भी ख़ुद को बस बेहतर इंसान बनाता चल — Lalit Mohan Joshi