"मैं तुम्हें लिखना चाहता हूँ"

मैं तुम्हें एक ख़्वाब लिखना चाहता हूँ
मैं तुम्हें एक ख़याल लिखना चाहता हूँ
तुम्हारे ज़ेहन में उठते हर सवाल का
मैं तुम्हें हर जवाब लिखना चाहता हूँ
वो आँखें वो होंठ वो गाल तुम्हारे
सब को मैं कमाल लिखना चाहता हूँ
वो तेरा नर्म लहजा और सख़्त मिज़ाज
मैं हूँ उस पर क़ायल लिखना चाहता हूँ

आँखों में मेरी दिखती ग़ज़ल हो तुम
तुम्हारे माथे पे मतला तो होंठों पे मिसरे लिखना चाहता हूँ
जिस दरख़्त की छाँव में बैठी तुम कुछ देर
मैं उस दरख़्त की मिसाल लिखना चाहता हूँ
उस दरख़्त को तू ने जो लिया आग़ोश में लिया
है उस का मुक़द्दर कमाल लिखना चाहता हूँ
मैं अल्मोड़ा से दिल्ली तलक घूमता रहा
पर तेरे शहर को कमाल लिखना चाहता हूँ
तुम हो अपने में अहल-ए-कमाल
सो मैं तुम पर किताब लिखना चाहता हूँ

— Lalit Mohan Joshi

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