पास वो होते हुए मिलता नहीं है
अब वो अपने नाम से मिलता नहीं है
मैं सदा उस को वहाँ देता रहा फिर
शोर में या'नी मुझे मिलता नहीं है
दर्द मेरा बाँटने वाला मुझे फिर
शख़्स ऐसा तो मुझे मिलता नहीं है
हो गया मैं अब अकेला और तन्हा
अब तो कोई भी गले मिलता नहीं है
ग़म को मेरे जो करे कम यार फिर वो
इक तरब-ज़ा भी मुझे मिलता नहीं है
वो अना में इस तरह है चूर रहता
बज़्म में तरतीब से मिलता नहीं है
जब लबों से ही ख़ुशी ग़ायब हुई हो
अब 'ललित' भी उस पते मिलता नहीं है
— Lalit Mohan Joshi















