दुआ भी नहीं कोई हक़ में रही है
मुझे मेरी क़िस्मत रुला कर गई है
लगाया कभी दिल को मैं ने यहाँ जो
मगर बे-वफ़ाई हमेशा मिली है
गुलाबों को तुम ने तो महका दिया था
जो फेरा है चेहरा वो ख़ुशबू गई है
सफ़र ज़िंदगी का मुझे ख़ूब भाया
मगर बस तुम्हारी कमी खल रही है
न मन में है उलझन न कोई शिकायत
तुम्हें खोया पाकर यही बस कमी है
जिसे मैं समझता रहा था सहारा
वही शाख़ आँधी में पहले गिरी है
मैं तन्हा ही चलता रहा उम्र भर से
ये दुनिया मगर मुझ से क्यूँ डर रही है
जिसे मंदिरों की तरह पूजता था
वो शाइ'र मुझे यूँ बना कर गई है
बुलंदी की ख़्वाहिश मुझे थी मगर अब
कई रास्तों या'नी अड़चन मिली है
वो कहती रही है सभी ठीक होगा
मगर ये तसल्ली भी अब थक गई है
वो माथा जो पटके ग़ज़ल यार बहती
ग़ज़ल तो ललित के यूँ ख़ूँ में रही है















