dua bhi nahin koii haq men rahi hai | दुआ भी नहीं कोई हक़ में रही है

  - Lalit Mohan Joshi

दुआ भी नहीं कोई हक़ में रही है
मुझे मेरी क़िस्मत रुलाकर गई है

लगाया कभी दिल को मैंने यहाँ जो
मगर बे-वफ़ाई हमेशा मिली है

गुलाबों को तुमने तो महका दिया था
जो फेरा है चेहरा वो ख़ुशबू गई है

सफ़र ज़िंदगी का मुझे ख़ूब भाया
मगर बस तुम्हारी कमी खल रही है

न मन में है उलझन न कोई शिकायत
तुम्हें खोया पाकर यही बस कमी है

जिसे मैं समझता रहा था सहारा
वही शाख़ आँधी में पहले गिरी है

मैं तन्हा ही चलता रहा 'उम्र भर से
ये दुनिया मगर मुझ सेे क्यूँँॅं डर रही है

जिसे मंदिरों की तरह पूजता था
वो शायर मुझे यूँँ बनाकर गई है

बुलंदी की ख़्वाहिश मुझे थी मगर अब
कई रास्तों यानी अड़चन मिली है

वो कहती रही है सभी ठीक होगा
मगर ये तसल्ली भी अब थक गई है

वो माथा जो पटके ग़ज़ल यार बहती
ग़ज़ल तो ललित के यूँँ ख़ूँ में रही है

  - Lalit Mohan Joshi

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