मुझे जिस पे बहुत ही ग़ुरूर था
बुरे वक़्त में वो मुझ से दूर था
बताता था मुझे जो हर एक बात
मगर आज वही शख़्स दूर था
मैं हर बात पे चुप क्या हुआ यहाँ
वो समझा कि मिरा ही क़ुसूर था
कभी दुनिया से उलझा था पहले मैं
तभी ख़ुद से यक़ीनन मैं दूर था
मुक़द्दर का है क़िस्सा अजीब सा
जिसे अपना कहा वो ही दूर था
— Lalit Mohan Joshi














