चलो घर को अपने अँधेरा हुआ है
मेरे ख़्वाब का यूँँ तमाशा हुआ है
यहाँ ज़ख़्म कितना ये गहरा हुआ है
सो इक शख़्स ख़ुद से ही हारा हुआ है
कभी दिल का जैसे वही था सहारा
वही देखो फिर आज बदला हुआ है
उसे ढूँढता था मैं जिस आइने में
वही जाने क्यूँ आज धुँधला हुआ है
ज़माना हुआ 'इश्क़ की बात भूले
मगर 'इश्क़ कैसे दुबारा हुआ है
मेरा गाँव कितना सरल और प्यारा
वही गाँव मुझ सेे जो छूटा हुआ है
वो बचपन की गलियाँ मैं चाहूँ भटकना
मगर अब वो बचपन पराया हुआ है
अमावस में खोजा गया चाँद लेकिन
फ़क़त मेरा रोकर गुज़ारा हुआ है
समझता है ख़ुद को जो आगे 'ललित' से
'ललित' का उसी से किनारा हुआ है
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